इसके बाद योजना को जमीन पर उतारने की कोशिश शुरू हुई। इसके मुताबिक टीम के हर सदस्य की एक अहम भूमिका मौजूद थी। कोई चारा डालकर पक्षियों को जमीन पर आने को मजबूर करता था। कुछ सदस्य पक्षियों को दूरबीन की सहायता से देखते थे।
एक सदस्य पक्षियों की पहचान के लिए बने नियमों के मुताबिक आंखों, लड़ने के तरीके, अंग, आकार पर दूरबीन से देखने वाले सदस्य से जानकारी मांगता था। एक सदस्य रजिस्टर पर मिली पहचान के आगे सही और गलत का निशान लगाता था। हर दिन हर सदस्य की भूमिका में बदलाव होता था, ताकि दूसरों को भी बराबर मौका मिले।
कोतवाल, मूटरी, सेवन सिस्टर्स, कबूतर, खंजन, मैना, बुलबुल, पीलक, नील कंठ, फाक्टा, कठफोड़वा, कोयल, टिटिहरी, हुदहुद, धानेश, शिकरा, पपीहा समेत पूर्वांचल में पाई जाने वाली 45 प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं।
गुलाबी मैना या गुलाबी सारिका स्टर्निडी परिवार का एक पक्षी है। इसमें मैना भी शामिल है। इनके अन्य नाम तिल्यर या तेलियर और कन्नड़ भाषा में इसके मधुर गीत के कारण इसे मधुसारिका भी कहते हैं। यह एक प्रवासी पक्षी है, जो अपने प्रवास के दौरान छह से आठ माह तक भारत में रहते हैं। ये पक्षी मुख्यत: मैदानी क्षेत्रों में रहते हैं। ये कजाकिस्तान समेत रूस में पाए जाते हैं।
महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी भी बना मेहमान
यूनिवर्सिटी कैंपस में मिले पक्षियों की जमात में महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी हरियल भी शामिल हैं। इसे पीले पैरों वाले हरे कबूतर के नाम से भी जाना जाता है। यह ट्रेरन फॉनीकॉप्टेरा की प्रजाति का है।
हर दिन किया छह घंटों तक काम
युवाओं ने बताया कि स्थान का चयन किए जाने के बाद एक समय सारिणी बनाई गई। दिन में उनकी ज्यादा हलचल ज्यादातर सुबह भोजन की तलाश और शाम को घर वापसी के दौरान होती है। इसे ध्यान में रखकर तीन-तीन घंटे सुबह 7-10 बजे और दोपहर से 2-5बजे की समय सारिणी बनाई गई। छह घंटो के बाद कभी पक्षी को पहचानने में सफलता मिल जाती थी, नहीं तो कई दिन निराश होकर भी घर लौटना पड़ता था।
युवाओं ने बताया कि 2013 की एवीआई बर्ड काउंट रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर इलाके के 5484 किलोमीटर के भूभाग में करीब 345 प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं। इसमें अकेले 1.214 किलोमीटर भूभाग में फैले यूनिवर्सिटी में 12.5 प्रतिशत पक्षी मौजूद हैं। इनमें लोकल पक्षियों के साथ ही मेहमान परिंदे भी शामिल हैं।
इनका मिला मार्गदर्शन
प्रोजेक्ट को पूरा करने में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के जुलोजी विभाग के शिक्षक प्रो. डीके सिंह, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. विनीत कुमार समेत कंचनजंगा वन्य अभ्यारण्य के पूर्व प्रधान वार्डेन प्रतीक चंदन को पूरा मार्गदर्शन मिला। समय समय इन अनुभवी शिक्षकों की टीम ने उन्हें प्रोत्साहित किया।