मनीष हत्याकांड में जांच करते एसआईटी कानपुर।
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गोरखपुर के होटल कृष्णा पैलेस में मनीष गुप्ता की मौत के मामले में मुख्य आरोपी इंस्पेक्टर जेएन सिंह और दरोगा अक्षय मिश्रा को गिरफ्तार किया गया। गोरखपुर पुलिस ने अमर उजाला तिराहे के पास से हत्यारोपियों को गिरफ्तार किया है। दोनों से रामगढ़ताल और क्राइम ब्रांच की टीम पूछताछ कर रही है। जल्द ही उन्हें कानपुर एसआइटी के हवाले कर दिया जाएगा। अन्य आरोपियों की तलाश में गोरखपुर के साथ ही कानपुर जिले की पुलिस छापेमारी कर रही है।
आगे पढ़िए कि हत्यारोपी पुलिसकर्मी किस तरह अपने ही झूठी कहानी में उलझ गए और एसआईटी ने इनकी करतूतों को पकड़ लिया...
मनीष गुप्ता की मौत के मामले में जांच कर रही एसआईटी ने तीन अक्तूबर को मानसी नर्सिंग होम से मेडिकल कॉलेज पहुंचने में लगने वाले समय और असल समय की जानकारी करने को सीन रीक्रिएशन तकनीकी का सहारा लिया था। टीम के सदस्य नर्सिंग होम से मेडिकल कॉलेज कुछ ही देर में पहुंच गए, वहीं घटना वाली रात हत्यारोपी पुलिस टीम को यह दूरी तय करने में एक घंटे से ज्यादा का समय लग गया था। इसके अलावा मनीष को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में लावारिस में दाखिल करने की बात भी छिपाई गई थी।
इन सवालों में फंसी पुलिस
सीन रीक्रिएशन में पता चला था कि अगर इंस्पेक्टर जेएन सिंह सच में मनीष गुप्ता को मेडिकल कॉलेज पहुंचाना चाहते तो एक घंटे से ज्यादा समय लगना संभव नहीं है। अब सवाल उठता है कि मानसी अस्पताल से रेफर किए जाने के बाद मनीष को लेकर पुलिस कहां गई थी? पुलिस ने मनीष को मेडिकल कॉलेज पहुंचने में देरी जानबूझकर की या सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए उसे मेडिकल कॉलेज ले जाया गया था?
पुलिस का झूठ दर झूठ
पहला झूट
घटना के बाद मीडिया और आला अफसरों को रामगढ़ताल थाने के इंस्पेक्टर जेएन सिंह ने बताया था कि शराब के नशे में होने की वजह से मनीष उठते ही जमीन पर गिर पड़े और मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। जबकि, उस रात मनीष और उनके भांजे दुर्गेश से बातचीत की एक रिकॉर्डिंग है, जिसमें पुलिस द्वारा जांच करने और उत्पीड़न करने की बात कही जा रही है। इससे पहला झूठ पकड़ा गया है कि वह उठते ही गिर पड़े थे और घायल हो गए थे।
दूसरा झूठ
हत्यारोपी पुलिस टीम ने ऐसा स्वांग रचा कि मानसी नर्सिंग होम में मनीष गुप्ता को ले जाने पर ही सांसें चल रही थीं। निजी अस्पताल प्रशासन ने इसकी जानकारी दी है कि जांच के दौरान ब्लड प्रेशर और पल्स नहीं मिल रही थी। इस वजह से हालत को गंभीर मानते हुए उन्हें मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। मेडिकल कॉलेज में भी इस बात की पुष्टि हो गई है कि वहां पहुंचने पर मनीष की पल्स नहीं चल रही थी।
तीसरा झूठ
हत्यारोपी पुलिस टीम ने कहा था कि नर्सिंग होम से रेफर होते ही मनीष को लेकर वह मेडिकल कॉलेज पहुंच गई थी। जबकि, रिकॉर्ड में जो समय दर्ज है, उससे यह बात साफ हो चुकी है कि उन्हें नर्सिंग होम से रेफर करने के बाद सीधे मेडिकल कॉलेज लेकर नहीं गई थी। एक घंटे से अधिक समय तक मनीष को लेकर यह टीम गायब थी।
चौथा झूठ
घटना के अगले दिन हत्यारोपी इंस्पेक्टर जेएन सिंह ने बताया था कि मनीष को मेडिकल कॉलेज में लावारिस में दाखिल नहीं कराया गया था। जबकि, एसआईटी की जांच में पता चला है कि पुलिस ने दो पर्चे बनवाए थे। पहले पर्चे में मनीष को लावारिस के तौर पर दाखिल किया गया था। पांच मिनट बाद ही बनवाए गए दूसरे पर्चे में मनीष को जिंदा कर दिया गया।
ये है पूरा मामला
कानपुर के बर्रा निवासी कारोबारी मनीष गुप्ता 27 सितंबर की सुबह आठ बजे गोरखपुर अपने दो दोस्तों हरवीर व प्रदीप के साथ घूमने आए थे। तीनों तारामंडल स्थित होटल कृष्णा पैलेस के कमरा नंबर 512 में ठहरे थे। 27 सितंबर की रात ही रामगढ़ताल थाना प्रभारी इंस्पेक्टर जगत नारायण सिंह, फलमंडी चौकी प्रभारी रहे अक्षय मिश्रा सहित छह पुलिस वाले आधी रात के बाद होटल में चेकिंग को पहुंच गए थे। कमरे की तलाशी लेने पर मनीष ने आपत्ति जताई तो पुलिसकर्मियों से उनका विवाद हो गया। आरोप है कि पुलिस वालों ने उनकी पिटाई कर दी थी जिससे उनकी मौत हो गई थी। शुरुआत में पुलिस की ओर से नशे में गिरने से मौत बताया था मगर बाद में हत्या का केस दर्ज किया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मनीष के शरीर पर कई जगह चोट के निशान मिले। मनीष की पत्नी मीनाक्षी की तहरीर पर पुलिस ने तीन नामजद और तीन अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया, तब जाकर परिवार के लोग शव लेकर कानपुर रवाना हुए थे।