शुरुआती दौर में आने वाले मरीजों का इलाज संभव है, लेकिन तीसरे और चौथे स्टेज के मरीजों की सर्जरी बेहद कठिन होती है। इसमें मरीजों के पलकों पर रेडियोथेरपी की जाती है। अगर जरा सी चूक होती है तो इसमें आंखों की रोशनी भी जा सकती है। ऐसे मरीजों को इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। रेफर करने वाले मेलिंगनेंट कैंसर वाले ज्यादा हैं। यह आंख के पुतली से लेकर आंख के अंदर भी हो सकता है।
बिनाइन नेत्र कैंसर से आंख की नसों पर पड़ रहा प्रभाव
डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि कैंसर आंखों की पलकों से लेकर आंख के किसी भी भाग में हो सकता है। पलक वाले कैंसर में पलकों में गिल्टियां बन जाती है या फिर बार-बार पलक पर सूजन हो जाता है। जांच में पुष्टि के बाद ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी से ऐसे मरीजों का इलाज किया जाता है। बताया कि बेनाइन नेत्र कैंसर में आंख की नसों पर दबाव पड़ता है। इससे रोशनी कम होने का खतरा रहता है।वहीं, मेलिगनेंट नेत्र कैंसर आंखों के साथ ही शरीर के अन्य भागों (लीवर, किडनी, हृदय, प्रोस्टेट आदि) में खून के माध्यम से फैलता है। इसके इलाज में देरी से जान चली जाती है।
50 फीसदी पलकों के कैंसर के कारण का पता नहीं
डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि पलकों के कैंसर का कारण 50 फीसदी मामलों में पता नहीं चल पाता है। इसे साइंस की भाषा में इडियोपैथी कहते हैं। जबकि 50 फीसदी कारणों में कोशिकाओं में म्यूटेशन आर्सेनिक, बेंजीन जैसे जहरीले रसायन का प्रभाव और वायरस का संक्रमण होता है।
डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि पलकों के अंदर गांठ का बनना, सूजन होना, घाव होना, पलक का गलत दिशा में मुड़ना या फिर बार-बार बरौनी गिर रहा है तो ऐसे लोगों को सावधान रहने की जरूरत है। ऐसे लक्षण हो रहे हैं तो तत्काल डॉक्टर से सलाह लें। इलाज के बाद भी वह डॉक्टरों के संपर्क में कुछ दिन तक जरूर रहें।
आंख में इस तरह के कैंसर वाले मरीजों की भी बढ़ रही संख्या
डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि नेत्र कैंसर जांच की अलग से क्लीनिक चलाई जाती है। इसमें आंखों में होने वाले ट्यूमर कैंसर के मरीज आते हैं। इनमें सबसे अधिक पलक, मेलिंगनेंट, रेटिनोब्लास्टोमा, आंख की सफेद झिल्ली के कैंसर, नेत्र गुहा और नाक, साइनस से आंख में पहुंचने वाले कैंसर के मरीज आ रहे हैं। हालांकि इनमें सबसे कम संख्या नाक, साइनस से आंख में पहुंचने वाले मरीजों की है।