जिला अस्पताल के डॉ. बीके सुमन ने बताया कि यह बीमारी दो प्रकार की होती है। जिन लोगों में रक्त का थक्का जमाने वाले फैक्टर आठ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया ए होता है और जिनमें फैक्टर नौ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया बी होता है।
नवजात में नहीं हो पाती हीमोफीलिया की पहचान
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि नवजात में हीमोफीलिया की पहचान नहीं हो पाती है, लेकिन जब वह दो से तीन महीने के हो जाते हैं तो पहचान होती है। ऐसे बच्चों का बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इलाज है।
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303 मरीज हीमोफीलिया के बीआरडी में पंजीकृत
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के 303 मरीज पंजीकृत हैं। इनमें 80 से 85 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर आठ लगाया जाता है। जबकि, 15 से 20 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर नौ लगाया जाता है। इनके अलावा एक हजार मरीजों में एक मरीज को फैक्टर सात लगाया जाता है। इस फैक्टर के मरीज जिले में न के बराबर हैं।