विनय शंकर तिवारी को पूर्वांचल में होने वाले सम्मेलनों में सपा ब्राह्मण चेहरे के तौर पर लाएगी। अब, शिवप्रताप शुक्ल को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने मास्टर स्ट्रोक खेला है। बहरहाल, इससे कितना फायदा भाजपा को होगा यह तो लोकसभा चुनाव में पता चलेगा, लेकिन फौरीतौर पर इसका फायदा जरूर मिला है।
यूपी में ब्राह्मणों की संख्या कुल आबादी का करीब 15 फीसदी है। जब भी ब्राह्मण मतदाता एक होकर वोट किए हैं, सरकार बनाने में उनकी भूमिका अहम रही है। वर्ष 2007 में मायावती की अगुआई में बसपा ने ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक को एक पाले में लाने में सफलता दर्ज की थी। तब बसपा ने 86 सीटों पर ब्राह्मणों को उतारा था। ब्राह्मणों ने मायावती को भी एकजुट होकर वोट दे दिया। मायावती का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला कामयाब रहा था।
वहीं, पिछले तीन चुनावों की बात करें तो ब्राह्मण वोट बैंक का झुकाव भाजपा की तरफ रहा है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ब्राह्मणों की पहली पसंद भाजपा रही। हर बार पूर्ण बहुमत से भाजपा की सरकार बनी। वर्ष 2024 में भी भाजपा जातीय संतुलन के आधार पर तैयारी में जुटी है। माना जा रहा है कि शिवप्रताप को बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी भी इसी की कड़ी है।