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Gorakhpur News: सियासत में वीरेंद्र शाही की इंट्री और लग गई बाहुबलियों की लाइन- जानिए कैसे शुरू हुआ ये सिलसिला

Sun, 31 Mar 2024 02:21 PM IST
रोहित सिंह टीपी शाही, गोरखपुर

सार

लक्ष्मीपुर से 1980 में वीरेंद्र प्रताप शाही के चुनाव जीतने के बाद 1985 के विधानसभा चुनाव में उनके धुर विरोधी कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी ने भी राजनीति में आने की ठानी। उन्होंने अपना राजनीतिक ठिकाना चिल्लूपार (इसी विधानसभा में उनका पैतृक घर है) को बनाया। वह भी निर्दलीय मैदान में उतरे और जीत हासिल कर विधायक बन गए।
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वीरेंद्र प्रताप शाही अपने समर्थकों के साथ (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आज के दौर में बाहुबली और माफियाओं का राजनीति में आना भले कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती लेकिन इसकी शुरुआत हुई थी 80 के दशक से, जब लक्ष्मीपुर विधानसभा से उपचुनाव में पहली बार भाग्य आजमाने उतरे माफिया वीरेंद्र प्रताप शाही। उस चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की और सदन में पहुंचने वाले पहले बाहुबली बने।
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शाही की जीत ने अन्य बाहुबलियों को भी प्रेरित किया और बाद के वर्षों में हरिशंकर तिवारी, अंबिका सिंह, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे कई नाम राजनीति में उतरे। 1980 में प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हो रहा था। तब महराजगंज जिला नहीं बना था।

वहां की लक्ष्मीपुर विधानसभा के एक निर्दलीय प्रत्याशी की चुनाव के दौरान मौत हो जाने के कारण चुनाव स्थगित कर दिया गया। उस समय गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी व वीरेंद्र शाही के बीच वर्चस्व की जंग चल रही थी। तिवारी और शाही के समर्थकों के बीच कई बार भिड़ंत हुई।
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शाही के करीबी गोधन सिंह के खास गगहा के बेचई पांडेय की हत्या कर दी गई। उसके बदले में शाही के समर्थकों ने तीन लोगों की हत्या कर दी। तुम एक को मारोगे, हम तीन को मारेंगे : 1980 के दशक में शोले फिल्म आई थी। उसका एक डॉयलॉग बहुत चर्चा में था। तुम एक को मारोगे हम तीन को मारेंगे। जब शाही -तिवारी की भिड़ंत में एक के बदले तीन लोगों की हत्या हुई तो शाही
 
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वीरेंद्र शाही अपने पालतू कुत्ते के साथ( फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
के समर्थक यही कहने लगे- तुम एक को मारोगे, हम तीन को मारेंगे। कहा जाता है कि जब शाही लक्ष्मीपुर से चुनाव लड़ने गए तो यही मुद्दा बनाया गया।

शिकागो से तुलना: नौतनवां के पूर्व प्रमुख एवं कांग्रेस के नेता अबरार अहमद इराकी कहते हैं कि तिवारी-शाही के वर्चस्व की लड़ाई की खबर बीबीसी से प्रसारित हुई कि अपराध की दुनिया में गोरखपुर का नाम है, तो देशभर में हड़कंप मच गया था।

चुनाव लड़ने से पहले भांपने गए लोगों का मूड : माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता एवं शाही के करीबी रहे राम मोहन शाही ने बताया कि वीरेंद्र शाही ने  उप चुनाव की घोषणा के बाद एक दिन उन्हें बुलाया। पांच लोगों क  साथ उन्हें नौतनवां भेजा। कहा कि वहां की जनता का मूड भांपों कि वहां की समस्या क्या है। वह पांच लोगों के साथ नौतनवां सहित क्षेत्र के कई स्थानों पर गए।

लोगों से बात की सबने कहा कि यहां तिवारी समर्थकों से शाही ही  मुकाबले में खड़ा हो सकते हैं।  जनता उन्हें वोट दे देगी। इस जानकारी के बाद शाही ने चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। इसके बाद नौतनवां जाने के लिए गोल सजने लगी।
 

पूर्व विधायक वीरेंद्र प्रताप सिंह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ। - फोटो : अमर उजाला
शाही का काफिला पहुंचा तो वहां उमड़ा जनसैलाब : शिक्षक नेता राम मोहन शाही बताते हैं, वीरेंद्र प्रताप शाही के नौतनवां पहुंचने का दिन ओर समय निर्धारित कर दिया गया। तय समय पर शाही जब नौतनवां के लिए निकले तो उनके काफिले में करीब 100 गाड़ियां शामिल हो गईं।

गाड़ियों में समर्थक अपने असलहे के साथ बैठे थे। गाड़ियों की खिड़कियों से निकली बंदूक और राइफल की नालों को लोग कौतूहलवश देख रहे थे। नौतनवां में पहली बार पहुंचे वीरेंद्र शाही को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी। शाही ने अपने भाषण में कहा था कि वह चुनाव जीते तो यहां आतंक खत्म कर देंगे। जनता ने उन पर भरोसा किया और जब परिणाम आया तो वह उनके पक्ष में था।

शाही के मुकाबले अमरमणि थे उम्मीदवार: 1980 में जब लक्ष्मीपुर विधानसभा उपचुनाव हो रहा था तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। अमर मणि त्रिपाठी संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी थे। कांग्रेस ने उनका समर्थन किया था। सामने थे वीरेंद्र शाही। जानकार बताते हैं कि शाही के काफिले को देखते हुए पुलिस सतर्क रहती थी, जब उनका काफिला निकलता तो पीएसी की दो गाड़ियां पीछे लगा दी जाती थीं।

लोगों को लगता था कि कहीं खूनखराबा न हो लेकिन, चुनाव सकुशल संपन्न हो गया और शाही विधायक बन गए।
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पंडित हरिशंकर तिवारी। (फाइल फोटो) - फोटो : Fb @hari shankar tiwari
जिला अस्पताल से लड़े थे शाही चुनाव: जिस समय शाही लक्ष्मीपुर का चुनाव लड़ रहे थे उस समय उनका ठिकाना जिला अस्पताल का प्राइवेट वार्ड था। वहीं वह अपने दल बल के साथ रहते थे। वहीं से वह चुनाव लड़े और जीते तो वहीं पर आए। बाद में उन्हें मोहद्दीपुर में मकान एलाट हुआ, जिसे उन्होंने खरीद लिया।

जेल से चुनाव लड़कर विधायक बने थे तिवारी : लक्ष्मीपुर से 1980 में वीरेंद्र प्रताप शाही के चुनाव जीतने के बाद 1985 के विधानसभा चुनाव में उनके धुर विरोधी कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी ने भी राजनीति में आने की ठानी।

उन्होंने अपना राजनीतिक ठिकाना चिल्लूपार (इसी विधानसभा में उनका पैतृक घर है) को बनाया। वह भी निर्दलीय मैदान में उतरे और जीत हासिल कर विधायक बन गए। जब वह पहली बार चुनाव जीते तब वह जेल में थे। तिवारी के नाम यह भी रिकॉर्ड है कि वह पहले नेता थे जो जेल से लड़कर चुनाव जीते।

वह यहां से लगातार दो बार विधायक बने। 85 के चुनाव में शाही भी दोबारा लक्ष्मीपुर
से विधायक बने। इसके अलावा कौड़ीराम से अंबिका सिंह ने भी 1993 में निर्दलीय के रूप में राजनीति में भाग्य आजमाया और जीत भी हासिल की।
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