ओपी सिंह प्रधानाचार्य एमजी इंटर कॉलेज।
- फोटो : अमर उजाला।
जब मैं कक्षा छह में था तो घर की माली हालत ठीक नहीं थी। शुल्क जमा करने के पैसे नहीं थे। लेकिन, मुझे पांच रुपये छात्रवृत्ति मिली। इसके बाद स्नातक तक की पढ़ाई मैंने छात्रवृत्ति के ही सहारे पूरी की। बीएड जब करने लगा तो 300 रुपये शुल्क था, मुझे याद है कि मां ने अपने गहने गिरवी रहकर मुझे पढ़ाया। सच मायने में अगर छात्रवृत्ति का सहारा नहीं मिलता तो आज मैं इस मुकाम पर नहीं पहुंचता।
यह कहना है राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित महात्मा गांधी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ओपी सिंह का, जिन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान छात्रवृति के महत्व के साझा किया। कुशीनगर के रामकोला के मूल निवासी ओपी सिंह ने बताया कि जब वे 1971 में कक्षा छह में थे तो उन्हें पांच रुपये की छात्रवृत्ति मिली।
इसी पैसे से उन्होंने फीस जमा किया, आगे की पढ़ाई जारी रखा। होनहार होने के करण फीस माफ कर दी गई, लेकिन कक्षा आठ तक छात्रवृत्ति मिलती रही, जो पढ़ाई में बहुत काम आई। बताया कि स्नातक के 600 छात्रों में तीन छात्रों को 60 रुपये की वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती थी।
इसे भी पढ़ें: चौरीचौरा में टैंकरों से हो रही थी डीजल की चोरी, छापा मारा तो पकड़ा गया खेल
तीन छात्रों में वह भी चुने गए और उन्हें 60 रुपये की छात्रवृत्ति मिली। इन्हीं पैसों से उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की। लेकिन, बीएड में छात्रवृत्ति की कोई व्यवस्था नहीं थी तो 300 रुपये की फीस के लिए उन्हें अपनी मां के गहने गिरवी रखने पढ़े। उन्होंने कहा कि अगर छात्रवृत्ति मिलती है तो उसका महत्व भी समझना चाहिए और ज्यादा मेहनत करनी चाहिए।