कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामचेत चौधरी ने कहा कि काला नमक चावल का इतिहास भगवान बुद्ध के समय का है। अन्य चावल की तुलना में काला नमक चावल में आयरन 3 गुना और जिंक 4 गुना अधिक होता है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स अन्य चावल से कम होने से इसे शुगर फ्री की श्रेणी में रखा जा सकता है। डायबिटीज (मधुमेह) के रोगी भी इसका सेवन कर सकते हैं।
डॉ. चौधरी दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह सप्ताह के अंतर्गत कृषि विभाग द्वारा आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। संवाद भवन में ‘जर्मप्लाज्म टू जेमप्लाज्म : स्टोरी ऑफ काला नमक राइस’ विषयक व्याख्यान को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अनुसंधान न होने से इस चावल की उत्पादकता के साथ ही स्वाद-सुगंध कम होने लगी थी। काला नमक को 2010 में भौगोलिक संपदा (जीआई) घोषित किया गया।
जीआई टैग मिलने के कारण इस किस्म को खास पहचान मिली है। पूर्वांचल में 2009 तक लगभग दो हजार हेक्टेयर जमीन में ही काले नमक चावल की खेती होती थी, जो अब बढ़कर लगभग पचास हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है। चावल की इस किस्म का रकबा 1 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रदेश सरकार ने कालानमक को सिद्धार्थनगर का ओडीओपी घोषित किया। बाद में इसे बस्ती, गोरखपुर, महराजगंज, संतकबीर नगर का भी एक जिला एक उत्पाद घोषित कर दिया गया।
डॉ. चौधरी ने बताया कि जब उन्होंने इस प्राचीन धान को व्यावसायिक बनाने के लिए रिसर्च शुरू किया तब सिद्धार्थनगर से करीब 250 किस्म के नमूने एकत्र किए गए। उस पर गहन अनुसंधान किया गया। केंद्र सरकार ने 2010 में केएन-3 नाम से बीज बनाने के लिए नोटिफाई किया। बाद में दो क्रमश: 101, 102 तथा किरन नामक बौनी प्रजाति विकसित की गई, जो पहले से अधिक सुगंधित एवं उच्च उपज वाली प्रजाति थी। स्वागत वक्तव्य डॉ. के. सुनीता ने तथा संचालन डॉ. प्रीति एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निखिल कांत शुक्ला ने किया। कार्यक्रम में कृषि संकाय के सह समन्वयक दीपेंद्र मोहन सिंह, डॉ. आरपी यादव समेत बड़ी संख्या में शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।