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Gorakhpur News: दावा- जमींदार राजा उदित सिंह के वंशज ने स्थापित कराई होगी शिवपिंडी

Mon, 25 Mar 2024 11:15 AM IST
रोहित सिंह रोहित सिंह, गोरखपुर

सार

1860 के बंदोबस्त रिकाॅर्ड के अनुसार, तत्कालीन अलीनगर दक्षिणी के जमींदार राजा उदित नारायण सिंह थे और उस पूरे क्षेत्र का अधिकार उन्हीं के पास था।
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कचहरी के अभिलेखों में जमींदार राजा उदित नारायण सिंह को बागी दर्ज हैं - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आर्यनगर की मंडी के भीतर जीर्ण-शीर्ण स्थिति में मौजूद भवन को लेकर वहां के पुराने जानकारों का दावा है कि ढाई सौ वर्ष पहले यह राजा उदित नारायण सिंह का ही रहा होगा। 1860 के बंदोबस्त रिकाॅर्ड के अनुसार, तत्कालीन अलीनगर दक्षिणी के जमींदार राजा उदित नारायण सिंह थे और उस पूरे क्षेत्र का अधिकार उन्हीं के पास था।
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चर्चा यह भी है कि वर्तमान में दस शिवपिंडी वहां मौजूद हैं, लेकिन सिर्फ मंडी भवन के अंदर खंडित शिवपिंडी और समाधिस्थल हैं। इसे सुरेंद्र सिंह ने स्थापित करवाया होगा।

जानकार बताते हैं-अलीनगर दक्षिणी के जमींदार राजा उदित नारायण सिंह के वंशज सुरेंद्र सिंह थे। हालांकि, सुरेंद्र सिंह का नाम सरकारी रिकाॅर्ड में कहीं नहीं है, लेकिन इनके पिता राजा उदित नारायण सिंह के बारे में रिकॉर्ड सरकारी दस्तावेजों में हैं।
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इसके मुताबिक, 1860 बंदोबस्त के तहत फिरंगियों ने अलीनगर (अब आर्यनगर) की मंडी के भवन, जो राजा उदित नारायण सिंह का था, उसे कब्जे में लिया था। फिर इनकी जमींदारी के तहत आने वाले अन्य भू-हिस्से और लोगों को भी अपने अधीन कर लिया था।

इस क्षेत्र के अन्नू बाबू ने बताया कि उनकी पीढि़यां जमींदार परिवारों के करीब रहीं। उन्हें पूर्वजों ने बताया था कि अलीनगर के इतिहास में उदित नारायण सिंह और उनके परिवार के लोगों का नाम इतिहास में दबा रह गया।

दरअसल, 1857 की बगावत के पहले उदित नारायण सिंह के वंशज सुरेंद्र सिंह और दो चचेरे भाइयों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। परिवार के सभी लोग खुद को सुरक्षित रखते हुए आगे की लड़ाई की योजना बनाते हुए क्षेत्र से निकल गए।

फिरंगी जब राजा उदित नारायण सिंह को नहीं खोज सके तो 1860 ई. बंदोबस्त के तहत सरकारी गजट पर उन्हें बागी का दर्जा देकर उनकी संपत्ति को सरकार में समाहित कर लिया।

कचहरी के रिकार्ड में 1860 बंदोस्तत रिकार्ड का हिंदी अनुवाद - फोटो : रोहित सिंह
रिकाॅर्ड रूम के दस्तावेजों की माने तो इसी बंदोबस्त के तहत 7 मई 1858 को ही उदित नारायण सिंह की तरफ से यह उल्लेख किया गया था कि उनका कोई पट्टीदार नहीं है। दावा किया जा रहा है कि उदित नारायण सिंह के वंशज को फांसी दी गई होगी और परिवार के अन्य लोग फिरंगियों से छिपते हुए दूर कहीं चले गए थे।

यह वह दौर था, जब उदित नारायण सिंह, शहर से गुमनाम हो गए थे। यही कारण है कि 1860 से लेकर अभी तक सिर्फ अलीनगर दक्षिणी के जमींदार उदित नारायण सिंह का तो उल्लेख है, लेकिन सुरेंद्र सिंह और अन्य लोगों का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

भाजपा के महानगर मंत्री गौरव तिवारी बड़ू कहते हैं- यह हैरत करने वाली बात है कि मंडी भवन के अंदर भगवान शिव की पिंडी भी स्थापित है। जबकि, परिवार के बुजुर्ग या आसपास के लोगों ने कभी शिव पिंडी को लेकर कोई जानकारी नहीं साझा की।

हां, सुरेंद्र सिंह ने 11 शिवपिंडी आजादी के पहले अलीनगर में स्थापति किए थे, इसकी चर्चा होती है। चर्चा यह भी है कि अलीनगर से विजय चौक जाते समय रास्ते में पड़ने वाले कुएं पर सुरेंद्र सिंह नहाते थे।

8 सितंबर 1890 में सरकार ने संपत्ति को कब्जे में लिया
रेवेन्यू रिकाॅर्ड के दर्ज अभिलेखों के अनुसार, आर्यनगर के उस जमीन के हिस्से की आराजी 1860 बंदोबस्त में 109 आराजी नंबर थी। इसी आराजी के अंदर भवन, जमीनें और अन्य काबिज दाखिल था। बंदोबस्त बदलते हुए आराजी नंबर बदलता गया, लेकिन इसी हिस्से का भवन जहां आज मंडी है, ये वहीं मौजूद है।

दरअसल, बंदोबस्त व्यवस्था के तहत 30 वर्ष में आराजी का पुर्ननिर्माण होता था। ऐसे में अंग्रेजों ने इसे 1860 में अपने अधीन किए इस आराजी( 109) को 7 अगस्त 1890 को वापस सरकार में शामिल कर लिया। इसका प्रमाण भी रिकाॅर्ड रूम में हैं।

इसमें साफ लिखा है कि 7 अगस्त 1890 ई मुकदमा नंबरी 47( तत्कालीन केस) इजलास( कोर्ट) असिस्टेंट मोहतमिम (वर्तमान में मजिस्ट्रेट) जमींदार से खारिज होकर सरकार बहादुर कैसरे हिंद होना करार पाया। 8 सितंबर 1890, में इस संपत्ति को सरकार के पक्ष में फिर से कर किया गया।
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शहादत स्थल न बन जाए अंग्रेजों ने कब्जे में ले लिया
बीएचयू से आर्कियोलॉजी में गोल्ड मेडलिस्ट रेनू अग्रवाल ने बताया कि सरकार की तरफ से आधिकारिक तौर से बागी घोषित किए जाने और 1858 की क्रांति तेजी से बढ़ते जाने की वजह से अंग्रेजों ने फिर से इसे अपने कब्जे में लिया।

क्योंकि, अगर जमींदारी में ही रहती तो स्वतंत्रता के मतवाले उक्त स्थान को उदित नारायण सिंह के परिवारों की शहादत स्थल के तौर पर मानने लगते। सरकार शिवपिंडी और समाधि स्थल की पुरातत्व विभाग से जांच करवा ले तो कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आ जाएंगे।

शिवपिंडी और शहादत सामने आए
रामलीला कमेटी के संरक्षक पंकज गोयल ने बताया कि रिकाॅर्ड में दर्ज राजा उदित नारायण सिंह के परिजनों की जानकारी तो अभिलेखों में दर्ज साक्ष्यों से सामने आ जाएगी। लेकिन, शिवपिंडी की दबी सच्चाई भी सामने आनी चाहिए। इस मंडी के आसपास के लोगों को भी सहर्ष अपनी सहमति बनाते हुए दबे और खंडित हो चुके शिवपिंडी को लेकर निर्णय लेना चाहिए।
 
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