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Netflix: सुप्रीम कोर्ट से नेटफ्लिक्स को मिली राहत, अवमानना की कार्यवाही पर लगाई रोक

Thu, 25 Jan 2024 09:43 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने ओटीटी प्लेटफॉर्म की भारतीय शाखा की दलीलों पर ध्यान दिया और उच्च न्यायालय से कहा कि वह इसके खिलाफ फिलहाल अवमानना कार्यवाही आगे न बढ़ाए।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को न्यायिक आदेश पर रोक के बावजूद डॉक्यूमेंट्री - 'वाइल्ड कर्नाटक' दिखाने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय की ओर से शुरू की गई अवमानना कार्यवाही पर रोक लगा दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने ओटीटी प्लेटफॉर्म की भारतीय शाखा की दलीलों पर ध्यान दिया और उच्च न्यायालय से कहा कि वह इसके खिलाफ फिलहाल अवमानना कार्यवाही आगे न बढ़ाए। इससे पहले, उच्च न्यायालय ने एक मामले में बीबीसी, डिस्कवरी और नेटफ्लिक्स सहित विभिन्न प्रसारकों के खिलाफ नागरिक अवमानना के आरोप तय किए थे, जहां फिल्म निर्माताओं और प्रसारकों पर डॉक्यूमेंट्री की रिलीज और प्रसारण के संबंध में अदालत के 2021 के अंतरिम आदेश की अवज्ञा करने का आरोप लगाया गया था।

सीजेआई ने की मौखिक टिप्पणी
सीजेआई ने ओटीटी दिग्गज के खिलाफ अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाते हुए मौखिक रूप से टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "नेटफ्लिक्स को अवमानना के लिए कैसे ठहराया जा सकता है? फुटेज को तुरंत हटा दिया गया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय के पास बहुत सारे महत्वपूर्ण मामले हैं। नेटफ्लिक्स के खिलाफ अवमानना का मामला क्यों चलाया जाए?" 
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क्या है पूरा मामला?
मामला रवींद्र एन रेडकर और उल्लास कुमार की याचिका पर 29 जून, 2021 को उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश से संबंधित है। इसमें शामिल फिल्म निर्माताओं और प्लेटफार्मों को वन विभाग से प्राप्त फिल्म और उसके रॉ फुटेज के किसी भी उपयोग, प्रकाशन, पुनरुत्पादन, प्रसारण, प्रसारण, विपणन, बिक्री या लेनदेन में शामिल होने से प्रतिबंधित किया गया है।

मामले के विवरण के अनुसार, मडस्किपर लैब्स और आईटीवी स्टूडियोज ग्लोबल ने 2014 में एक डॉक्यूमेंट्री को फिल्माने के लिए कल्याण वर्मा और अमोघवर्ष से संपर्क किया था। एक डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग के लिए कर्नाटक वन विभाग (केएफडी) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के बाद, आरोपी ने कथित तौर पर बिना कोई शुल्क चुकाए परिवहन और शूटिंग अनुमति जैसी केएफडी की सेवाओं का इस्तेमाल किया। हाई कोर्ट में आरोप लगाया गया कि फीस माफ करने के लिए जरूरी इजाजत नहीं ली गई थी।

इसके बाद हाई कोर्ट ने 29 जून, 2021 को याचिका पर एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें फिल्म के प्रकाशन या प्रसारण से रोक की बात कही गई थी।  हालांकि, फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई और ब्रॉडकास्टर प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुई। इसके बाद शिकायतकर्ताओं ने हाई कोर्ट के समक्ष अवमानना याचिका दायर की। मूल याचिका अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है।
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