'धुरंधर' में अक्षय खन्ना
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खौफ में था ल्यारी इलाका
पाकिस्तान के कराची का ल्यारी इलाका- तंग गलियां, भीड़भाड़, बेरोजगारी, अपराध और गैंगवार की लंबी दास्तानों वाला एक शहर। 1700 के दशक से अस्तित्व में रहे इस क्षेत्र में गरीबी और उपेक्षा ने हमेशा आपराधिक गिरोहों को जगह दी। यही वह दुनिया थी जहां 1979 में मोहम्मद दादल के घर एक बच्चे का जन्म हुआ- सरदार अब्दुल रहमान बलूच, जिसे पूरी दुनिया बाद में रहमान डकैत के नाम से जानने लगी।
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कहते हैं रहमान ने किशोरावस्था में ही अपराध की राह पकड़ ली थी। 13 साल की उम्र में पहली बार हत्या, 15 साल की उम्र में परिवार से जुड़ी एक भयावह घटना—इन प्रारंभिक कथाओं ने उसे एक ऐसे रास्ते पर धकेल दिया, जहां हिंसा उसकी पहचान बन गई।
राजनीति में जब रखा कदम
सिर्फ गनपावर ही नहीं, रहमान ने राजनीति में भी अपने पैर जमाने शुरू कर दिए। पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के स्थानीय नेताओं से उसका बढ़ता संपर्क उसे एक "लोकल पावर सेंटर" के रूप में स्थापित कर रहा था। उसने अपना नाम बदलकर सरदार अब्दुल रहमान बलूच रखा और 2008 में पीपल्स अमन कमेटी बनाई, जिसका दावा था कि उसका उद्देश्य शांति स्थापित करना है। लेकिन राजनीतिक उठापटक और गिरोहों की बदलती समीकरणों के बीच रहमान खुद भी विवादों का केंद्र बन गया।
खौफनाक रहमान डकैट का अंत
अगस्त 2009 में कराची पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में रहमान की मौत हो गई। पर उसकी मौत जितनी सरल दिखाई दी, उतने ही बड़े सवाल पीछे छोड़ गई। स्थानीय नेताओं और विश्लेषकों का मानना है कि रहमान की हत्या गैंगवार, राजनीतिक दबाव और खुफिया सौदों के बीच पनपे किसी बड़े खेल का हिस्सा थी। रहमान तो 29 साल की उम्र में खत्म हो गया, लेकिन उसकी दहशत, उसके किस्से और उसकी निर्दयी छवि आज भी ल्यारी की दीवारों पर एक दाग की तरह मौजूद है। और अब धुरंधर के माध्यम से यह नाम भारत की जनता के बीच भी चर्चा का हिस्सा बन गया है।