रतन कहार
बीरभूम के प्रसिद्ध भादु लोक गायक रतन कहार ने लोक संगीत को 60 वर्ष से अधिक समय समर्पित किया है। उन्हें जात्रा लोक रंगमंच में मनोरम भूमिकाओं के लिए जाना जाता है। भादु त्योहार के गीतों और तुसु, झुमुर और अलकाब जैसी शैलियों में उन्हें विशेषज्ञता हासिल है। उनकी रचना 'बोरो लोकेर बिटी लो' लोकप्रिय है। आर्थिक तंगी और मजदूर परिवार से आने के बावजूद, उन्होंने 16 साल की उम्र में गाना शुरू किया और एक अमिट छाप छोड़ी।
ओमप्रकाश शर्मा
ओमप्रकाश शर्मा ने 200 साल पुराने मालवा क्षेत्र के पारंपरिक नृत्य नाटक 'माच' को सात दशकों से अधिक समय तक प्रचारित किया। उन्होंने माच थिएटर प्रस्तुतियों के लिए स्क्रिप्ट लिखी और संस्कृत नाटकों को माच शैली में दोबारा तैयार किया। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में सेवा करते हुए एनएसडी दिल्ली और भारत भवन भोपाल में छात्रों को प्रशिक्षित किया। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले, ओमप्रकाश ने अपने पिता से उस्ताद कालूराम माच अखाड़े के तहत कला सीखी थी
नारायणन ई पी
नारायणन ई पी थेय्यम की पारंपरिक कला को बढ़ावा देने के लिए छह दशक समर्पित किए हैं। कन्नूर के अनुभवी थेय्यम लोक नर्तक - पोशाक डिजाइनिंग और फेस पेंटिंग तकनीकों सहित पूरे थेय्यम पारिस्थितिकी तंत्र में नृत्य से आगे बढ़ने में उन्हें महारत हासिल है। पांच साल की उम्र में उन्होंने अपने छह दशक लंबे करियर की शुरुआत की। उन्होंने थेय्यम के 20 प्रकारों में 300 प्रदर्शनों में कला का प्रदर्शन किया। थेय्यम थिएटर, संगीत, माइम और नृत्य का संयोजन करने वाला एक प्राचीन लोक अनुष्ठान है, जो आम तौर पर गांव के मंदिर के सामने चेंडा, फ्लैथलम, कुरुमकुजल जैसे संगीत वाद्ययंत्रों के साथ किया जाता है। उन्होंने एक ड्राइवर के रूप में शुरुआत की, अब इस कला के संरक्षण के लिए समर्पित रूप से काम कर रहे हैं।
भागवत पधान
भागवत पधान ने बरगढ़ के सबदा नृत्य लोक नृत्य के प्रतिपादक हैं। महादेव का नृत्य मानी जाने वाली कला को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने अपने जीवन के पांच दशक से अधिक समय समर्पित किया। उनके आजीवन प्रयासों ने 600 से अधिक नर्तकियों को प्रशिक्षित करने सहित इस नृत्य शैली को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1960 के दशक के दौरान लोअर प्राइमरी स्कूल के शिक्षक के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने वित्तीय चुनौती का सामना किया, लेकिन अपनी कला के प्रति समर्पण कभी नहीं छोड़ा।
बदरप्पन एम
बदरप्पन एम कोयंबटूर के वल्ली ओयिल कुम्मी लोक नृत्य के प्रतिपादक हैं। ये गीत और नृत्य प्रदर्शन का एक मिश्रित रूप है, जिसमें देवताओं 'मुरुगन' और 'वल्ली' की कहानियों को दर्शाया गया है। मुख्य रूप से पुरुष-प्रधान कला होने के बावजूद, बदरप्पन महिला सशक्तीकरण में विश्वास करते थे और इस तरह उन्होंने इस परंपरा को तोड़ा और महिला कलाकारों को प्रशिक्षित किया है।