सिनेमा या आज के जमाने में सीरीज, भी ऐसा ही पेशा है जिसमें दर्शक विषय के प्रति ईमानदारी चाहते हैं। जरूरी नहीं कि सीरीज करोड़ों में बनी हो। देसी विदेशी पुरस्कार पाने वाले कलाकार उसमें हों। दर्शक ‘फैमिली मैन’ भी उसी चाव से बिंज वॉच करते हैं जैसे कि ‘गुल्लक’, ‘ये मेरी फैमिली’ और ‘पंचायत’। लेकिन, साल का पहला महीना आधा बीतने को है और एक सीरीज ऐसी सामने आनी अब भी बाकी है जिसके बिंच वॉच की सिफारिश मैं पाठकों से कर सकूं। डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ एक मेडिकल थ्रिलर है और इसके कथानक में एक कालजयी सीरीज बनने का माद्दा भी है, पर इसकी मेकिंग में मामला पूरा फिल्मी हो गया है।
विपुल अमृतलाल शाह नामी फिल्म निर्माता और निर्देशक हैं। कहानियों पर खासी रिसर्च भी करते हैं। सोचते भी हर बार अलहदा ही हैं, बस उनके पास उनकी सोच को परदे पर उतारने वाले कारीगर इस सीरीज में नहीं है। ‘अलीगढ़’ लिखकर चर्चा में आईं इशानी बनर्जी वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ की टीम में हैं तो समझा जा सकता है कि कहानी का एक मुख्य किरदार समलैंगिक क्यों है? मोजेज सिंह भी अपने किरदारों को उनकी अपनी ‘जुबान’ देने के लिए जाने जाते हैं। दोनों ने मिलकर एक मेडिकल थ्रिलर लिखा है, कम से कम डिज्नी प्लस हॉटस्टार इस सीरीज का प्रचार प्रसार इसी श्रेणी की सीरीज के तौर पर करता रहा है। कहानी, निर्देशन, अभिनय, संगीत और तकनीकी दक्षता के पैमाने पर कसें तो वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ औसत से थोड़ी बेहतर सीरीज ही दिखती है।
वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ बनाने वालों ने एक ऐसी श्रेणी पर 10 एपीसोड की कहानी कहने की कोशिश की है, जिसकी मांग इन दिनों हर ओटीटी वाला मुंबई फिल्म जगत के निर्माताओं से कर रहा है। ओटीटी को पता है कि उनके हिसाब से वही निर्माता चल सकते हैं जिनकी फिल्में अतीत में बॉक्स ऑफिस पर हांफ चुकी हैं। ये भी महज संयोग ही है कि इस हफ्ते रिलीज हुई वेब सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ और ‘ह्यूमन’ दोनों की पृष्ठभूमि बीजेपी शासित प्रदेश हैं। इन दोनों प्रदेशों मे पर्याप्त फिल्म सब्सिडी भी बंटती है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जो झलक ‘ये काली काली आंखें’ दिखाती है, उस पर उत्तम प्रदेश का सपना देखने वालों में से किसी को गर्व नहीं होगा। और, वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ मध्य प्रदेश के समाज और सियासत का ऐसा चेहरा दिखाती है, जो प्रदेश की ब्रांडिंग के लिहाज से अच्छा नहीं है।
कोरोना वैक्सीन बनाने की विफलता के चलते हुआ बड़ा आर्थिक नुकसान, एक नई दवा का मानवों पर येन केने प्रकारेण परीक्षण, भोपाल गैस त्रासदी, नर्सों के समूहों के बीच की ऊंच नीच और गरीबों का एक ऐसा झुंड जिसकी अहमियत पैसे के लालची लोगों के लिए भेड़ बकरियों जैसी ही है। ‘दिल्ली क्राइम’ से वाहवाही लूटने वाली शेफाली शाह बतौर अभिनेत्री यहां एक ऐसे किरदार को निभाने की पूरी कोशिश करती हैं जिसके भीतर के जज्बात खत्म हो चुके हैं। इसकी वजह भी भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ती है, लेकिन अपनों को न बचा पाने का खुद को गुनहगार समझती आ रही ये डॉक्टर कब, कैसे, कहां बहकेगी, इस पर सीरीज का संतुलन टांग देना सीरीज का संतुलन बिगाड़ देता है। विदेशी सीरीज देखने सुनने वालों ने अब हर किरदार को अपूर्ण दिखाना ही कहानी की जीत मान लिया है। लेकिन हिंदी भाषी दर्शकों के बीच अब भी सही और गलत की दीवार कायम है। उसे गिरने में अभी समय लगेगा।
सीरीज का दूसरा सिरा कीर्ति कुल्हारी के किरदार पर टंगा है। कीर्ति रंगमंच से निकली अभिनेत्री हैं। अभिनय में वह नाट्य रसों का प्रकटन भी सलीके से करती हैं। उनके किरदार का अतीत भी कहानी में लचक लाता है। वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ के दोनों शीर्ष किरदारों का महिला होना और उनके पतियों के साथ का उनका रिश्ता कहानी का कलेवर तो तैयार करता है लेकिन इसका विस्तार न होने और इन घटकों को रंग सीरीज के कैनवस पर अच्छे से न फैलने से कहानी दर्शकों से तारतम्य नहीं जोड़ पाती। समीक्षा लिखनी है तो सीरीज पूरी देखने की कोशिश हर समीक्षक करता है लेकिन इस सीरीज में इतने अवसादों और झंझावातों को देखकर मन भी अवसाद से भरने लगता है।
वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ एक अच्छे विचार पर बनी ऐसी सीरीज है जिसमें विषय विशेषज्ञों को शामिल करके और इसके मुख्य किरदारों को उनके पेशेगत कार्यकलापों में और व्यस्त दिखाकर सीरीज को वाकई एक मेडिकल थ्रिलर बनाया जा सकता था। ऐसी कहानियों की पहली जरूरत यही होती है कि ये जिस पेशे की कहानियां कह रही हैं, उनका अधिकतर समय उस पेशे वाली जगह पर ही बीतना चाहिए। वातावरण किसी भी कहानी का अभिन्न अंग होता है और उस पर ध्यान न देना वेब सीरीज ‘ह्यूमन’ को कमजोर कर देता है। डिज्नी प्लस हॉटस्टार की इस सीरीज में एक कमाल की मेडिकल थ्रिलर सीरीज बनने का दमखम है, बस ये मात खाती है तो अपनी जल्दबाजी और अपने गमजदा माहौल से।