फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गुलजार को ज्ञानपीठ: बेहतरीन निर्देशक के साथ उम्दा गीतकार भी हैं गुलजार, लेखन से लाखों दिलों पर करते हैं राज

Sat, 17 Feb 2024 09:24 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

गुलजार ने निर्देशक के साथ गीतकार के रूप में भी खूब वाहवाही बटोरी। उन्होंने सऐ जिंदगी गले लगा ले, तेेरे बिना जिंदगी से और आने वाला पल जाने वाला है जैसे कई सदाबहार गाने लिखे हैं।
विज्ञापन
गुलजार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अपने गीतों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले मशहूर गीतकार गुलजार को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। प्रसिद्ध कथाकार प्रतिभा राय की अध्यक्षता वाली चयन समीति ने जगतगुरु रामभद्राचार्य के साथ उनके नाम का भी एलान किया है। उर्दू के लिए उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा की गई है। 

विज्ञापन

Pushpa: अल्लू अर्जुन की फिल्म 'पुष्पा' ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में बिखेरा जलवा, निर्माताओं ने जाहिर की खुशी

पड़ोस के घर में की लेखन की प्रैक्टिस
गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1936 को दीना, जिला झेलम हुआ था। उनका असली नाम संपूरण सिंह कालरा है। उनके पिता का नाम माखन सिंह कालरा और मां का नाम सुजान कौर था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आकर बस गया। शुरुआत से ही गुलजार का मन लेखन और संगीत में लगा करता था, लेकिन परिवार के लोग इसे समय की बर्बादी समझा करते थे। यही वजह थी कि वे गुलजार के इन शौक के खिलाफ थे। परिवार के विरोध के वजह से वे घरवालों से छुपकर पड़ोस के घर जाकर लिखने की प्रैक्टिस किया करते थे।

मैकेनिक का करना पड़ा काम
लेखन और संगीत का जुनून उन्हें मायानगरी कहलाने वाली मुंबई तक ले आया। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वे मुंबई तो आ गए, लेकिन जिंदगी गुजारने के लिए उस समय उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। इस शहर में टिके रहने के लिए उन्होंने कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं। दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए उन्हें मैकेनिक तक का भी काम करना पड़ा। काम के दौरान  उनकी पहचान प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन के लेखकों से होने लगी थी। यहीं से उनके करियर की गाड़ी सही दिशा में बढ़ने लगी। काफी संघर्ष के बाद उन्हें बिमल रॉय, ऋषिकेश  मुखर्जी और म्यूजिक  डायरेक्टर हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला।

इस मशहूर निर्देशक ने दिया पहला मौका
सहायक के तौर पर काम करने के दौरान उन्हें बिमल रॉय ने ही गाना लिखने का पहला मौका दिया। गुलजार ने अपना पहला गाना फिल्म बंदिनी के लिए 'मोरा गोरा अंग' लिखा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। गुलजार के काम करने के तरीके से प्रभावित बिमल रॉय ने उन्हें सहायक निर्देशक के तौर काम करने का मौका दिया। यही से उनके निर्देशन करने का रास्ता तय हुआ। अपने निर्देशन करियर की शुरआत उन्होंने मेरे अपने नाम की फिल्म से की थी। उन्होंने परिचय, कोशिश, अचानक, आंधी, अंगूर, माचिस और हूतूतू जैसी शानदार फिल्मों का निर्देशन किया। 

गीतकार के रूप में खूब हुए मशहूर
गुलजार ने निर्देशक के साथ गीतकार के रूप में भी खूब वाहवाही बटोरी। सदमा से ऐ जिंदगी गले लगा ले, आंधी से तेेरे बिना जिंदगी से, गोलमाल से आने वाला पल जाने वाला है, खामोशी से हमने देखी हैं आंखों से, मासूम से तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, परिचय से मुसाफिर हूं यारों, थोड़ी सी बेवफाई से हजार राहें मुड़ के देखी जैसे गाने आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं। 
विज्ञापन

कई पुरस्कार किए अपने नाम
बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुलजार अब तक कई प्रतिष्ठिक अवॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं। आनंद, नमक हराम और माचिस फिल्म के बेहतरीन संवाद के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ डायलॉग राइटर का फिल्मफेयर मिल चुका है। वहीं, मौसम के लिए वे सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार जीत चुके हैं। मेरा कुछ सामान और यारा सिली सिली जैसे गानों के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2004 में कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित कर चुकी है। वहीं, साल 2013 में हिंदी सिनेमा में उनके विशेष योगदान के लिए  उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।
The Indrani Mukerjea Story: 'द इंद्राणी मुखर्जी स्टोरी' पर बैन लगाने की मांग, सीबीआई ने किया अदालत का रुख
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें