दिया मिर्जा की फिल्मों में शुरुआत 'रहना है तेरे दिल में' जैसी सुपरहिट फिल्म से हुई। 2001 में रिलीज हुई इस फिल्म में दिया मिर्जा के साथ आर माधवन थे। पहली फिल्म चलने के बाद भी दिया मिर्जा ने जल्दबाजी में ऐसी फिल्में साइन कीं जिसमें फिल्म की मेकिंग स्टाईल और पटकथा दोनों ही कमजोर थी।
'दीवानापन', 'तुमको न भूल पाएंगे', 'तहजीब', 'प्राण जाए पर शान न जाए' वह फिल्में रहीं जिसमें दिया मिर्जा की भूमिका तो अच्छी थी पर यह फिल्में बहुत ही कमजोर ढंग से बनीं। इसका सीधा खामियाजा दिया मिर्जा को उठाना पड़ा। विवेक ओबराय के साथ आई 'दम' फिल्म चली पर इसका क्रेडिट विवेक के खाते में दर्ज हुआ। यह उनकी फिल्म थी भी।
इमरान हाशमी के साथ 2004 में रिलीज हुई फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' कि असफलता ने यह संकेत दे दिया कि दिया मिर्जा अब फिल्मों की सोलो नायिका के रूप में शायद ही दिखें। ऐसा हुआ भी। आने वाले सालों में दिया मिर्जा पर्दे पर तो दिखती रहीं पर उनकी भूमिका कम और महत्वहीन होती गई।
'परिणिता', 'ब्लैकमेल' और 'दस' जैसी सफल फिल्मों से दिया मिर्जा को इतना जीवनदान मिला कि वह इंडस्ट्री में बनी रहीं। फिल्मकारों को साइड नायिका के रूप में दिया मिर्जा बुरी भी नहीं लगीं। इसके बाद उनकी फिल्में 'शूट आउट लोखंडवाला', 'लगे रहो मुन्नाभाई', 'फाइट क्लब', 'दस कहानियां' और 'क्रेजी फोर' जैसी फिल्में रिलीज हुईं। कुछ फिल्में चलीं तो कुछ फ्लाप हुईं। न तो इन फिल्मों की सफलता से दिया का कोई लाभ हुआ और न ही इनके फ्लाप होने से उनका नुकसान।
इस बीच दिया मिर्जा ने आइटम नंबर करके लाइम लाइट में आने का प्रयास किया। 'हे बेबी' और 'फिर हेराफेरी' जैसी फिल्मों में यह प्रयोग दिखे पर इंडस्ट्री को रास वह भी न आया। 2011 में रिलीज हुई 'लव ब्रेकअप्स जिंदगी' फिल्म से दिया मिर्जा ने इंडस्ट्री में मुख्य नायिका के रूप में रीइंट्री का प्रयास किया। फिल्म बहुत तो नहीं चली पर दिया ने दिखाया कि उनको नायिका के रूप में कंसीडर किया जा सकता है। हालांकि इस फिल्म का भी दिया को कोई लाभ नहीं हुआ। 2012 में उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई। 2013 में रिलीज हो रही 'किस्मत की कंपनी' जैसी मल्टीस्टारर फिल्म में दिया एक बार फिर दिखेंगी।