अभिनेता धर्मेंद्र जब पहली बार बम्बई आए तब दूर के रिश्ते की अपनी एक बहन के घर उनको ठिकाना मिला था। पर वह अधिकांश समय अपने साथियों के साथ गुजारते थे।
एक दिन उन्होंने बताया कि किसी फिल्म निर्माता ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया है और उसके कार्यालय पहुंचने में मैं उनका साथ दूं। मैं भी चूंकि उन दिनों बेकारी का जीवन बिता रहा था इससे मुझे उनके साथ चलने में कोई आपत्ति नहीं हुई।
संबंधित फिल्म के तीन भागीदार थे। जब हम लोग उनके कार्यालय में पहुंचे, तो उन लोगों ने धर्मेंद्र का इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया। पहला भागीदार दूसरे साथियों से बोला, `लड़का तो अच्छा लग रहा है।’ दूसरे ने कहा, `हीरा है, हीरा।’ तीसरा बोल उठा, `वह भी लाखों का!’
पहले वाले ने फिर कहा, `तो कान्ट्रैक्ट कर लो। साइनिंग अमाउन्ट भी दे दो एक हजार एक रुपए का।’ दूसरे ने उसकी बात काटी `क्या कह रहे हो? एक हजार एक? अरे, पांच सौ एक काफी हैं।’
तीसरा बोल उठा, `साइनिंग अमाउन्ट में क्या धरा है, भाई? एक सौ एक पकड़ा दो और किस्सा खत्म करो।’ पहले ने कहा, `चलो, निकालो पैसे।’ दूसरा बोला, `मेरे पास तो इतने पैसे नहीं हैं।’ तीसरे ने निर्देश दिया, `चलो, हम सब मिल कर अपनी जेबों को टटोलें।’ सबने अपनी जेबों को खंगाला। निकले कुल इक्यावन रुपये और हीरो साइन कर लिया गया।