नाम में क्या रखा है...बेरहामपुर को बंगाली बेहरामपुर कहते हैं, लेकिन यहां के संसदीय चुनाव में नाम में बहुत कुछ रखा है। कांग्रेस प्रत्याशी अधीर रंजन चौधरी से बेहतर शायद ही कोई जान सकता होगा क्योंकि यहां उनका नाम ही दांव पर है। लगातार पांच बार से सांसद और लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के इस नामवर नेता को एक गुजराती क्रिकेटर से कड़ी चुनौती मिल रही है। तृणमूल कांग्रेस से मैदान में उतरे धुआंधार बल्लेबाज यूसुफ पठान ने इस उमर में उन्हें गली-गली हाथ जोड़ने को मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है, क्योंकि अधीर से उनकी खुन्नस तब से है, जब दोनों कांग्रेस में हुआ करते थे। कांग्रेसवाले आरोप भी लगाते हैं कि ममता ने मुस्लिम उम्मीदवार इसीलिए उतारा भी है कि अधीर का वोट बंटे और भाजपा जीत जाए। ममता कहती हैं कि कांग्रेस से राज्य में उनका गठबंधन अधीर की वजह से ही न हो सका। कुछ हद तक यह सही भी है। भाजपा ने 66 साल के सर्जन डॉ. निर्मल कुमार साहा को मैदान में उतारा है।
मुर्शिदाबाद जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है बेरहामपुर। पॉलिटिकल पॉवर हाउस मानी जाने वाली यह सीट बंगाल की राजनीति में बेहद अहम है। साल 1952 से 80 तक 28 साल लगातार वामपंथी पार्टी आरएसपी के त्रिदीब चौधरी सांसद रहे। 75 साल के संसदीय इतिहास में यहां के लोगों ने सिर्फ पांच लोगों को ही मौका दिया। माकपा समर्थित प्रत्याशी अधीर अगर जीत जाते हैं, तो नया रिकॉर्ड कायम करेंगे। इस लोकसभा क्षेत्र की सात विधानसभा सीटों में से छह तृणमूल के खाते में हैं। सिर्फ एक सीट भाजपा के पास है।
मुसीबत में साथ नहीं रहने पर दादा से नाराज
शहर में कसाईबाड़ा मोड़ के पास बसा जमींदारी इलाका हिंदू-मुस्लिम मिलीजुली आबादी वाला है। यहां तृणमूल का जोर दिखता है। एक नुक्कड़ पर बतकही कर रहे खुर्शीद आलम कहते हैं कि अधीर दादा से लोग नाराज हैं। कोरोना टाइम में हम लोग इतना परेशान रहे और दादा दिल्ली में पड़े रहे। मानते हैं कि मुस्लिम वोट अधीर और यूसुफ में आधा-आधा जाएगा। युवाओं का रुझान यूसुफ की तरफ है। यूसुफ के खिलाफ बाहरी का तो मुद्दा है ही, यहां की आम बोलचाल की भाषा बंगाली उन्हें नहीं आती है। इस कारण उन्हें संवाद संबंधी समस्या है।
सीट मुस्लिम बहुल...पर कभी नहीं रहा मुस्लिम सांसद
पिछली सदी तक कम्युनिस्टों का गढ़ रही इस सीट पर 25 साल से कांग्रेस का कब्जा है। हैरत की बात है कि यहां मुस्लिम आबादी लगभग 67 फीसदी है, लेकिन यहां से कभी कोई मुस्लिम सांसद नहीं रहा। करीब 16 लाख वोटरों वाली इस सीट पर पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को महज 11% वोट मिले थे। अधीर ने तृणमूल प्रत्याशी को करीब 80 हजार वोटों से हराया था। इस बार अधीर कड़े मुकाबले में फंसे हैं। 2014 में उनकी जीत का अंतर 30 फीसदी से ज्यादा था, जो 2019 में महज छह फीसदी रह गया। हालांकि, संसद में भाजपा पर हमलावर रहने वाले अधीर को पुरानी पीढ़ी का मुसलमान पसंद करता है।
राबिनहुड वाली छवि के चौधरी कभी वामपंथी हुकूमत, तो अब तृणमूल के वर्चस्व के बीच भी राज्य में कांग्रेस को जिंदा रखे हुए हैं। उनकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में आलाकमान की इच्छा के खिलाफ जाकर बागियों को जिता दिया। यही छवि लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनने में मददगार रही। बतौर कम्युनिस्ट सियासत शुरू करने वाले चौधरी विस का पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर ही लड़े थे।
तो वाराणसी में मोदी जी भी बाहरी
बंगाल को अपनी कर्मभूमि बताने वाले यूसुफ पठान कहते हैं कि चुनाव को लेकर वह उतने ही उत्तेजित हैं जितने कि अपने पहले विश्व कम मैच में थे। बाहरी बताए जाने पर वे कहते हैं कि मेरी तरह मोदी जी भी गुजरात से हैं, लेकिन वे चुनाव तो वाराणसी से लड़ते हैं। लोग आपकी काबिलियत देखते हैं, बाहरी-भीतरी नहीं। कांग्रेस समर्थक सुकांत चटर्जी कहते हैं कि यहां यूपी की तरह हिंदू-मुस्लिम नहीं चलता है, यूसुफ को मुस्लिम वोट नहीं मिलेगा। दादा 25 साल से सांसद है, विकास किया है। बगल में खड़े जियाउद्दीन भी उनकी हां में हां मिलाते हैं। उधर, एक वर्ग यह भी प्रचारित कर रहा है कि यूसुफ गुजराती है, मोदी का आदमी है, उसको वोट नहीं मिलेगा, अधीर की टक्कर भाजपा से है। एक वर्ग यह भी मानता है कि इस बार मुस्लिमों में नागरिकता कानून मुद्दा नहीं है। दो साल पहले के विधानसभा चुनाव में ममता इसका खौफ दिखाकर पूरा दोहन कर चुकी हैं। मुस्लिमों को भी यह अहसास हो चला है कि सरकार किसी की भी हो, उन्हें देश से बाहर निकालने की बात महज चोचलेबाजी है।
यहां के युवाओं से बात करें तो उनकी सबसे बड़ी बेचैनी बेरोजगारी को लेकर हैं। यहां कोई बड़ी इंडस्ट्री है नहीं, प्राइवेट सेक्टर भी ऐसा व्यापक नहीं है कि युवा खप सकें। वे चाहते हैं कि यहां की जूट इंडस्ट्री में जान डाली जाए। नौकरी के लिए पलायन उनकी मजबूरी है। प्रदीप सरकार कहते हैं कि यहां की सबसे बड़ी जरूरत उद्योग लगाने की है और विडंबना देखिए कि कोई पार्टी इस पर बात ही नहीं कर रही है। युवाओं की दूसरी फिक्र भ्रष्टाचार है। ममता के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के लगातार सामने आते मामले उन्हें विचलित करते हैं। उनकी नजर में भाजपा, तृणमूल एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं। संदीप सरकार कहते हैं, हमें सरकार से खैरात देने वाली योजनाएं नहीं, नौकरी चाहिए। जिस 23 हजार शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया पूरी होने में करीब दो दशक लग गए, उसे एक झटके में रद्द किए जाने का आक्रोश भी उनमें है। इस सबसे बड़े तबके की नाराजगी शायद मतदान के दिन नजर आए, किसके लिए, यह बाद में पता चलेगा।
भाजपा की रणनीति
यहां माहौल में गहमागहमी और गरमागरमी दिखती है। भाजपा प्रत्याशी की कोई सभा भारत माता की जय व वंदे मातरम के बगैर पूरी नहीं होती। मुस्लिम वोट के सवाल पर डॉ. साहा कहते हैं कि हम कोई मुस्लिम विरोधी थोड़े न हैं। हमें राष्ट्रवादी मुस्लिमों का वोट चाहिए। कोई हिंदू भी अगर राष्ट्रवादी नहीं है, तो हमें उसका वोट भी नहीं चाहिए। भाजपा ध्रुवीकरण के जरिये मौका तलाश रही है। उसे मुस्लिम वोटों में बंटवारे का भरोसा है। इसीलिए वह यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यहां जनसभा करा चुकी है।
राष्ट्रवादी रंग दूसरों पर भी दिख रहा है। तृणमूल की रैली में भी वंदे मातरम के जयकारे लगे। वाईएमसी रोड मैदान में तृणमूल की रैली में आए मुर्शिदाबाद विवि के छात्र कहते हैं कि लोग कह रहे हैं कि यूसुफ बाहरी है, जीत जाएगा तो यहां ज्यादा दिखेगा नहीं। हम तो चाहते ही हैं कि हमारा सांसद यहां ज्यादा न दिखे। दिल्ली में ही रहे, संसद में हमारी आवाज उठाए। यहां कभी-कभार आएगा तो भी चलेगा।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार दल मत%
अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस 45.97
अपूर्वा सरकार तृणमूल 39.69
कृष्णा जोयरदार भाजपा 11.12
2014
अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस 50.5
इंद्रनील सेन तृणमूल 19.66
प्रमोथो मुखर्जी आरएसपी 19.55