थिंक फाउंडेशन नामक एनजीओ के एक विशेषज्ञ का कहना है कि देश भर में ऐसे 350 से ज्यादा मरीज रजिस्टर्ड हैं, जिनमें ये बॉम्बे ब्लड ग्रुप पाया गया है। लेकिन आपातकालीन परिस्थितियों में जरूरत पड़ जाए, तो इनमें से सिर्फ 30 ही एक्टिव डोनर हैं।
यह तो सिर्फ पॉजिटिव की बात हुई। अगर बॉम्बे निगेटिव ब्लड ग्रुप की बात करें, तो ये और भी ज्यादा रेयर है।
अगर किसी मरीज को इस ब्लड ग्रुप की जरूरत पड़ जाए, तो कम समय में इसके लिए डोनर मिलना बेहद मुश्किल है। क्योंकि ब्लड बैंकों में इस ब्लड ग्रुप को स्टोर नहीं किया जाता।
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यहां तक कि सिर्फ कुछ ही ऐसे ब्लड बैंक हैं जहां इसके डोनर का डेटा रिकॉर्ड रखा गया है। ये ब्लड बैंक जरूरत पड़ने पर डोनर को कॉल करते हैं, जिसमें काफी वक्त लग जाता है।
इस संबंध में एक्टिविस्ट जाहिद खंबट्टी का कहना है कि ब्लड बैंकों को ऐसे रेयर ब्लड ग्रुप्स के लिए एक कॉमन रजिस्ट्री रखनी चाहिए। ताकि जरूरत पड़ने पर मरीज को तुरंत खून उपलब्ध कराया जा सके।