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क्या है बॉम्बे ब्लड ग्रुप? एक हफ्ते में अस्पतालों में बढ़ गई है इसकी मांग

Mon, 09 Sep 2019 11:48 AM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

  • अस्पतालों में बढ़ रही है बॉम्बे ब्लड ग्रुप की मांग
  • मरीजों के लिए अलग-अलग जगहों से मंगाया जा रहा है इस ग्रुप का खून
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सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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आमतौर पर हम ब्लड ग्रुप के कितने प्रकार जानते हैं? A, B, AB और O ब्लड ग्रुप। इन सभी के निगेटिव और पॉजिटिव ग्रुप्स। जब भी खून की जांच होती है, तो इनमें से ही कोई एक ब्लड ग्रुप पाया जाता है। लेकिन इन दिनों अस्पतालों में एक अलग तरह के ब्लड ग्रुप की मांग है। इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप के नाम से जानते हैं।

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बीते करीब एक हफ्ते में इस बॉम्बे ब्लड ग्रुप की मांग तेजी से बढ़ी है। सवाल है कि ये बॉम्बे ब्लड ग्रुप आखिर है क्या? अचानक ये ब्लड ग्रुप कैसे और कहां पाया गया? ऐसे सभी सवालों के जवाब हम आपको आगे बता रहे हैं।

बॉम्बे ब्लड ग्रुप काफी रेयर है। इन दिनों सबसे ज्यादा मुंबई के अस्पतालों में इसकी मांग बढ़ी है। टाटा मेमोरियल, हिंदुजा समेत यहां के अलग-अलग अस्पतालों में कई मरीजों को इसकी जरूरत पड़ रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए राज्य के अलग-अलग हिस्सों से यह खास तरीके का खून मंगाया जा रहा है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि यह बॉम्बे ब्लड ग्रुप 7600 से ज्यादा लोगों में से किसी एक में यह ब्लड ग्रुप पाया जाता है।

साल 1952 में एक डॉक्टर ने ही इसकी खोज की थी। क्योंकि इसकी खोज मुंबई में की गई थी, जिसका नाम तब बॉम्बे था, इसलिए इस खास तरीके के खून का नाम भी बॉम्बे ब्लड ग्रुप पड़ गया।

देश में कितने लोगों का है ये बॉम्बे ब्लड ग्रुप

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थिंक फाउंडेशन नामक एनजीओ के एक विशेषज्ञ का कहना है कि देश भर में ऐसे 350 से ज्यादा मरीज रजिस्टर्ड हैं, जिनमें ये बॉम्बे ब्लड ग्रुप पाया गया है। लेकिन आपातकालीन परिस्थितियों में जरूरत पड़ जाए, तो इनमें से सिर्फ 30 ही एक्टिव डोनर हैं।

यह तो सिर्फ पॉजिटिव की बात हुई। अगर बॉम्बे निगेटिव ब्लड ग्रुप की बात करें, तो ये और भी ज्यादा रेयर है।

अगर किसी मरीज को इस ब्लड ग्रुप की जरूरत पड़ जाए, तो कम समय में इसके लिए डोनर मिलना बेहद मुश्किल है। क्योंकि ब्लड बैंकों में इस ब्लड ग्रुप को स्टोर नहीं किया जाता।

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यहां तक कि सिर्फ कुछ ही ऐसे ब्लड बैंक हैं जहां इसके डोनर का डेटा रिकॉर्ड रखा गया है। ये ब्लड बैंक जरूरत पड़ने पर डोनर को कॉल करते हैं, जिसमें काफी वक्त लग जाता है।

इस संबंध में एक्टिविस्ट जाहिद खंबट्टी का कहना है कि ब्लड बैंकों को ऐसे रेयर ब्लड ग्रुप्स के लिए एक कॉमन रजिस्ट्री रखनी चाहिए। ताकि जरूरत पड़ने पर मरीज को तुरंत खून उपलब्ध कराया जा सके। 
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