सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनमें से अधिकांश छात्र समाज के गरीब तबके से आते हैं, जो कि अविश्वसनीय रूप से सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर निर्भर हैं। इन सभी के लिए पढ़ाई की संभावना अपनी आजीविका के लिए है। ऐसे छात्रों के लिए दुर्गम और दूर-दराज के परीक्षा केंद्र बनाने के दुष्परिणामों की कल्पना करना मुश्किल है। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक परीक्षा के लिए लंबी दूरी की यात्रा करने में असमर्थता का परिणाम केवल छात्र द्वारा परीक्षा छोड़ने के तौर पर होगा, जो आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
पीठ ने कहा यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि नई शिक्षा नीति, 2020 के अध्याय-6 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित समूहों के लिए ग्रुप वॉक, साइकिल के प्रावधान आदि के माध्यम से उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए और संस्थान तथा परीक्षा केंद्रों की दूरी को कम करने पर जोर दिया गया है। पीठ ने कहा कि एनआईओएस मान्यता प्राप्त संस्थानों से 10 किलोमीटर की दूरी के भीतर परीक्षा केंद्रों को निर्धारित करने का प्रयास करे।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि एनआईओएस का यह कर्तव्य है कि वह परीक्षा केंद्रों को इस तरह से तय करे कि छात्र निश्चित रूप से और आसानी से परीक्षा में शामिल हो सकें। एनआईओएस परीक्षा देने के लिए छात्रों से गांवों और कस्बों से लंबी दूरी तय कराने की अपेक्षा अतिरिक्त केंद्र बना दिए जाए।
हम इस तथ्य से अवगत हैं कि परीक्षा केंद्रों को ठीक करना एक संवेदनशील कर्तव्य है, जिसमें सुरक्षा और निरंतर निगरानी शामिल है। हम इस तथ्य से भी अवगत हैं कि परीक्षाओं के संचालन में ईमानदारी शिक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इसके लिए हर कदम उठाया जाना चाहिए। इसके साथ ही, बेंच ने कहा कि एनआईओएस को परीक्षा केंद्र बनने की पेशकश करने वाले आवेदन को पहचानने, स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।