आधुनिक भारत में श्री अरविंद घोष नाम के एक ऐसे शिक्षाविद हुए जिनके व्यक्तित्व मे योगी, कवि और दार्शनिक, तीनों का समन्वय था और वे सबके सब एक ही लक्ष्य की ओर गतिशील थे। श्रीअरविन्द का जन्म कृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता के एक समृद्ध डाक्टर श्री कृष्णधन घोष के यहाँ हुआ था। जब वे सात वर्ष के थे उन्हें शिक्षा के लिये अपने भाइयों के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया गया, वहाँ वे चौदह वर्ष रहे। वहाँ उन्होंने ग्रीक, लेटिन, के अतिरिक्त फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन, स्पेनिश आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।
भारतीय शिक्षा चिन्तन में रहा महत्त्वपूर्ण योगदान
श्री अरविंद घोष
श्री अरविन्द का शिक्षा-दर्शन लक्ष्य की दृष्टि से आदर्शवादी, उपागम की दृष्टि से यथार्थवादी, क्रिया की दृष्टि से प्रयोजनवादी तथा महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से मानवतावादी है। हमें इस दृष्टिकोण को शिक्षा में अपनाना चाहिए। श्री अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है।
वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को 'अति मानस' तथा स्वयं को 'अति मानव' में परिवर्तित कर सकता है। अरविन्द का ये मानना था कि ये सारी बातें केवल शिक्षा द्वारा ही संभव हो सकती है।
राष्ट्रीय आन्दोलन में लगे हुए विद्यार्थियों को शैक्षिक सुविधाएं प्रदान करने हेतु कलकत्ता में एक राष्ट्रीय महाविद्यालय स्थापित किया गया। श्री अरविन्द को 150 रुपये प्रति माह के वेतन पर इस कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए श्री अरविन्द ने 'राष्ट्रीय शिक्षा' की संकल्पना का विकास किया तथा अपने शिक्षा-दर्शन की आधारशिला रखी। श्री अरविन्द के लिये भारतवर्ष देश का टुकड़ा, पर्वत, खेत, जंगल, और नदियों का नाम न था। उनके लिये भारत माता एक देवी थी। माँ थी। ये विचार उनकी शिक्षा पद्यति में भी साफ दिखाई देता है।