अदालत ने गठित की थी सात सदस्यीय समिति
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने एफटीआईआई को अपने फिल्म मेकिंग एवं संपादन पाठ्यक्रम में कलर ग्रेडिंग मॉड्यूल को बाहर करने या इसे वैकल्पिक बनाने का निर्देश दिया था। इस मुद्दे को देखने के लिए अदालत द्वारा गठित सात सदस्यीय समिति के बहुमत का दृष्टिकोण इसी पर आधारित था। पीठ ने कहा, समिति के निष्कर्ष स्पष्ट तौर पर कहता है कि सभी व्यक्तियों को एफटीआईआई में सभी पाठ्यक्रमों के लिए अनुमति दी जाएगी। किसी भी पाबंदी को दूर किया जा सकता है। एफटीआईआई को मौजूदा डिप्लोमा और फिल्म संपादन पाठ्यक्रमों में कलर ब्लाइंडनेस वाले उम्मीदवारों को भी शामिल करना चाहिए।
यह है पूरा मामला
दरअसल, अपीलकर्ता ने सत्र 2015 में फिल्म संपादन में डिप्लोमा पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए आवेदन किया था। वह संपादन में तीन वर्षीय स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए सभी आवश्यकताओं को पूरा करता था। चयन के बाद जब डॉक्टर ने उसकी जांच की तो वह कलर ब्लाइंड पाया गया। एफटीआईआई ने इस जांच रिपोर्ट के आधार पर उनका प्रवेश रद्द कर दिया, क्योंकि एफटीआईआई प्रवेश परीक्षा नियमों के तहत कलर ब्लाइंड छात्रों को संस्थान में संपादन पाठ्यक्रम में प्रवेश देने पर पाबंदी है।
कलर ब्लाइंडनेस, अंधापन नहीं
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कला एक गैर-अनुरूपतावादी क्षेत्र है। एफटीटीआई एक प्रमुख संस्थान है और कोई भी उम्मीद करेगा कि वह उदार विचार प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करें और किसी भी अनुरूपता ढांचे में फिल्मों से जुड़े पाठ्यक्रमों को न रखे। पीठ ने यह भी कहा कि कलर ब्लाइंडनेस, अंधापन का स्वरूप नहीं है, बल्कि एक कमी है। यह एक चिकित्सीय स्थिति है, जिससे रंगों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।