गर्मी और उमस के मिश्रण की घटनाएं उत्तरी-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, लाल सागर के तटीय क्षेत्र और कैलिफॉर्निया की खाड़ी ही वरन भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे एशियाई देशों में भी नजर आ रही हैं। खाड़ी देशों सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात के शहरों में तो ऐसी घटनाएं उच्च स्तर पर हो रही हैं।
इन सबके मूल में जाते हैं तो वैज्ञानिक वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन में बदलाव को इंगित करते हैं। ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक स्टीवन शेरवुड के अनुसार, अगर कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं ला पाए तो ऐसी घटनाओं का बढ़ना स्वाभाविक है। वे कहते हैं कि ये आकलन दर्शाते हैं कि धरती के कुछ भागों में जल्द ही इतनी गर्मी हो जाएगी कि वहां रह पाना संभव नहीं होगा।
भारत में क्या बदला
- 1901 के बाद से 2020 रिकॉर्ड आठवां सबसे गर्म वर्ष था। लेकिन यह 2016 में दर्ज किए गए सर्वाधिक गर्म तापमान की तुलना में काफी कम था।
- पिछले दो दशक 2001-2010 और 2011-2020, क्रमशः 0.23 डिग्री सेल्सियस और 0.34 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड सबसे गर्म दशक थे।
- 1901 के बाद से 15 सबसे गर्म वर्षों में से 12 पिछले डेढ़ दशक 2006 और 2020 के बीच रहे थे।
- 1901-2020 के दौरान देश का औसत वार्षिक औसत तापमान 0.62 डिग्री सेल्सियस/100 वर्षों की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।
- भारत में खराब मौसम की वजह से पिछले साल 1,565 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
- वहीं, चक्रवात ने 2020 में देश में 115 लोगों और 17,000 से अधिक पशुओं की जान ली थी।
देश में इस सदी के रिकॉर्ड पांच सबसे गर्म वर्ष
- 2016 (0.71 डिग्री सेल्सियस)
- 2009 (0.55 डिग्री सेल्सियस)
- 2017 (0.541 डिग्री सेल्सियस)
- 2010 (0.539 डिग्री सेल्सियस)
- 2015 (0.42 डिग्री सेल्सियस)
दुनिया में ऐसे हो रहा बदलाव
- इसी सप्ताह कनाडा में 49.5 डिग्री सेल्सियस (121 डिग्री फारेनहाइट) का उच्च तापमान रिकॉर्ड किया गया है। ऐसा 1937 के बाद हुआ था। यहां अब तक 45 डिग्री सर्वाधिक था।
- अमेरिका के पोर्टलैंड, ओरेगांव में रविवार को 112 डिग्री फॉरेनहाइट तापमान दर्ज किया गया था। शनिवार को यह 108 डिग्री फॉरेनहाइट यानी रिकॉर्ड 42.2 सेल्सियस था।
- इससे पहले 1965 और 1981 में तापमान 41.7 डिग्री सेल्सियस तक गया था।
- आंकड़ों को देखें तो 1998 को छोड़कर, दुनिया के 19 सबसे गर्म वर्षों में से 18 साल 2001 के बाद ही दर्ज किए गए हैं।
- वहीं इतिहास में 2016 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज हुआ था।
- 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, तापमान पिछले 20 वर्षों में जिस तेजी से बढ़ा है उतना 118 वर्षों (1901-2018) में कभी नहीं देखा गया।
हीट वेव क्यों आ रही है?
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, हीट वेव यानी गर्मी की लहर उत्तर-पश्चिमी डोम पर उच्च दबाव के कारण आ रही हैं। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से इनकी तीव्रता अधिक खतरनाक हुई है। संयुक्त राज्य अमेरिका के सिएटल, पोर्टलैंड और कई अन्य शहरों ने सभी समय के गर्मी के रिकॉर्ड को तोड़ दिया, कुछ स्थानों पर तापमान 115 डिग्री फारेनहाइट (46 डिग्री सेल्सियस) से ऊपर पहुंच गया।
भड़क सकती है जंगलों की आग
अमेरिकी वैज्ञानिक पश्चिम क्षेत्र के खतरनाक गर्मी और सूखे की चपेट में आने के बीच, जंगल की आग की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। कनाडा के पर्यावरण ने वाशिंगटन, ऑरेगन, इडाहो और मोंटाना के कुछ हिस्सों के साथ-साथ सस्केचेवान और दक्षिणी अल्बर्टा के लिए भयंकर गर्मी की चेतावनी दी है। जहां खतरनाक और ऐतिहासिक गर्मी की लहर इस सप्ताह बनी रहेगी। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भी इसे स्वीकार है और कहा, इस सप्ताह दर्ज किया गया तापमान अभूतपूर्व है। सैकड़ों की जान चली गई है और जंगल की आग का खतरा खतरनाक रूप से उच्च स्तर पर है।
भारत में कैसी है खतरे की स्थिति?
अगर भारत की ही बात करें तो हाल ही के वर्षों में देश में आने वाले चक्रवाती तूफानों की आवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी है। बात चाहे तौकते तूफान की करें या अम्फान की। वैश्विक तपन में वृद्धि के कारण तूफान और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर सरकार की ओर से कुछ साल पहले एक कार्य योजना तैयार कराई गई थी। उसमें चिंता जताई गई थी कि वर्ष 2021 से 2050 के दौरान समुद्री तापमान में 1.8 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के एक अध्ययन में आशंका जताई गई है कि अरब सागर में चक्रवातों की फ्रीक्वेंसी और तीव्रता दोनों में वृद्धि हो रही है। उल्लेखनीय है कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाले हर चार चक्रवातों की तुलना में अरब सागर में केवल एक चक्रवात बनता है। ऐसे में आईआईटीएम का अध्ययन कई चिंताएं पैदा करता है। पर्यावरणविद वैश्विक तपन के लिए कोयले को सबसे बड़ी वजह करार देते हैं। जबकि भारत अभी बिजली उत्पादन के लिए कोयला आधारित ताप बिजली घर पर निर्भर है। ये प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत रहे हैं।
इंसानों ही नहीं, जीव-जंतुओं को भी खतरा
ऐसा ही कुछ दुनियाभर के मौसम विज्ञानी भी कहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष 2100 तक ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्री जलस्तर एक मीटर तक ऊंचा हो जाएगा। इससे चक्रवात, बाढ़, सुनामी जैसी आपदाओं में भी बढ़ोतरी होगी। कई ग्लेशियर और हिम क्षेत्र समुद्र में समाते जा रहे।
साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान से हिमालय, अलास्का, आइसलैंड, आल्पस और पामीर का बर्फीला इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। 2000 से 2010 के बीच कार्बन उत्सर्जन की हमारी दर पिछले दशक की तुलना में चार गुना बढ़ चुकी है।
मौजूदा स्थिति के अनुसार, पृथ्वी का तापमान इस शताब्दी के अंत तक 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इससे भले ही मनुष्यों पर सीधा प्रभाव न पड़े, लेकिन वन्य और जलीय जीव-जंतुओं और वानस्पतिक प्रजातियों को काफी खतरा है।
कहां कैसा तापमान