कहते हैं, ‘लहरों से डरकर के नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हर नहीं होती।’ ये पंक्तियां तो आपने जरूर सुनी होंगी। लेकिन अगर आपका लक्ष्य आपके सामने हो, मंजिल कुछ ही दूरी पर हो और तब आपको वापस किसी कारणवश वापस मुड़ना पड़े तो शायद ही आप उस राह पर दोबारा चलने के लिए तैयार हो।
बलजीत मूलरूप से हिमांचल प्रदेश के सोलन जिले के पंजरोल गाँव की रहने वाली हैं। पिता अमरीक सिंह हिमांचल रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन में बस ड्राइवर थे और मां गृहणी। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन बलजीत के मन में बचपन से ही कुछ अलग करने का जज्बा था। वह बचपन से ही फिजिकल फिटनेस, खेलकूद में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वालों में से थीं।
बलजीत कौर ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली तो उन्होंने शहर जाकर पढ़ाई करने का मन बनाया। बेटी की इच्छा को देखते हुए अभिभावकों ने भी उनका पूरा सहयोग किया। लेकिन प्रतिदिन गाँव से कॉलेज जाना उनके लिए काफी मुश्किल होता जर रहा था।
सफलता टॉक में साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि, “जब मैंने घर से बाहर रहकर पढ़ाई करने का प्रस्ताव मां के सामने रखा तो वह मेरी इस बात के लिए भी तैयार हो गईं लेकिन उस वक्त हमारे पास इतना पैसा नहीं था कि शहर में रहने का खर्च उठा सकें। तब मेरी मां ने अपने सारे गहने बेच दिए और उससे मिलने वाली रकम से मुझे अपने सपने पूरे करने का मौका दिया।”
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