औरैया के दिव्यांशु रविवार को अपने वतन सुरक्षित वापस आ गए, लेकिन उनके 15 दोस्त अभी यूक्रेन में ही फंसे हैं। दिव्यांशु दिल्ली से अपने घर औरैया जा रहे थे, लेकिन उनका मन यूक्रेन में अपने दोस्तों के पास लगा था। उनके दोस्त भारत आने के लिए फ्लाइट पकड़ने 24 फरवरी को यूक्रेन की राजधानी कीव गए थे। लेकिन रूसी हमले के बाद शहर में मार्शल लॉ लग गया और वो फंस गए।
यूक्रेन में फंसे दिव्यांशु के दोस्तों में लखनऊ के मो. अनस, बिजनौर की गुरप्रीत कौर, छत्तीसगढ़ की यूविका मलागर जैसे बाकी दोस्त हैं। यूक्रेन में तनावपूर्ण महौल के बीच विश्वविद्यालय ने देशी-विदेशी छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प दिया था। ऐसे में दिव्यांशु और उनके तमाम साथियों को यू्क्रेन स्थित भारतीय दूतावास की ओर से लगातार एसएमएस भेजा जा रहा था, कि जबतक यूक्रेन के हालात सामान्य नहीं हो जाते वो स्वदेश लौटकर ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से पढ़ाई करें। इस बात को ध्यान में रखते हुए छात्रों ने वतन वापसी के लिए फ्लाइटें बुक करा रखी थीं। दिव्यांशु ने 27 फरवरी को और उनके तमाम दोस्तों ने 24 फरवरी को कीव हवाई अड्डे से दिल्ली आने के लिए फ्लाइट बुक कराई थी।
कीव पहुंचते ही छिड़ गई लड़ाई
दिव्यांशु के दोस्त उजहोरोद नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से 23 फरवरी को ट्रेन के जरिए कीव शहर पहुंचे। 24 फरवरी शाम को उनकी दिल्ली के लिए फ्लाइट थी। लेकिन सुबह जैसे ही वो कीव पहुंचे वहां मार्शल लॉ लग गया।
भूखे-प्यासे रेलवे स्टेशन पर रहे
कीव रेलवे स्टेशन पर सभी छात्र फंस गए। यहां वह किसी तरह जान बचाकर तीन दिन-रात भूखे-प्यासे पड़े रहे। दिव्यांशु ने बताया कि रविवार को सुबह भारतीय दूतावास ने सभी छात्रों से संपर्क किया और इन्हें बस में बैठाकर उजहोरोद ले आए हैं। कल सुबह इन्हें हंगरी के बुड़ापेस्ट हवाई अड्डे ले जाया जाएगा, जहां से सोमवार शाम को संभव है इन्हें दिल्ली की फ्लाइट मिल जाए।
परिस्थियां तय करेंगी इन छात्रों का भविष्य
यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्रों का भविष्य परिस्थितियां तय करेंगी। औरैया के दिव्यांशु शेखर हों, मथुरा के वंशी प्रताप सिंह या फिर मरादाबाद के इमरान अली जैसे करीब 16 हजार भारतीय छात्रों का भविष्य अधर में लटका है। दो देशों की लड़ाई में छात्रों की पढ़ाई का क्या होगा, अभी तय नहीं है। दिव्यांशु शेखर प्रथम वर्ष के छात्र हैं और पिछले साल दिसम्बर में यूक्रेन पढ़ाई करने गए थे। लड़ाई खत्म होने के बाद जैसा माहौल होगा, वो वैसा कदम उठाएंगे।
यूक्रेन से दिल्ली पहुंचे तो यूपी भवन में बातचीत करते हुए छात्र इमरान अली भावुक हो गए। खुद को संभालते हुए इमरान बोले... अभी परिजनों से तो नहीं मिला, लेकिन लगता है कि घर आ गया हूं। सरकार ने यूक्रेन से हमें लाने में बड़ी मदद की। एयरपोर्ट से यूपी भवन मेहमान बनाकर लेकर आई। यहां के अधिकारियों ने बड़े प्यार से हाल-चाल पूछा, नहाने-खाने का बंदोबस्त किया और अब सरकारी कार में बैठाकर घर भेज रहे हैं।
इमरान ने बताया कि 24 फरवरी की तड़के 4 बजे अचानक उनकी आंख खुली, तो उन्हें जोर-जोर से आपातकालीन अलार्म बजता सुनाई पड़ा। उन्होंने फोन के जरिए अपने हॉस्टल में लगातार अलार्म बजने की वजह जानी, तो उन्हें बताया गया कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है। हकीकत जानने के बाद उनके अगले चार दिन उलझन में गुजरे। उन्हें और वहां सभी को यही डर सता रहा था कि कहीं उनके ऊपर भी बम न गिर जाए। इमरान बमबारी वाली जगह से करीब 700 किलोमीटर दूर वेस्ट यूक्रेन में थे। वह उझोरोड नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते हैं। यह यूक्रेन का सबसे शांत इलाका है। क्योंकि, यह यूरोप से सटा हुआ है। यहां से स्लोवाकिया, पोलैंड और हंगरी आधे घंटे में पहुंचा जा सकता है।
जेब में नहीं थे पैसे, मेरा देश मुझे वापस ले आया
यूक्रेन से रविवार को वतन लौटने वाले 240 छात्रों में गाजियाबाद के देवेश कौशिक भी थे। यूपी भवन में वह उत्तर प्रदेश के 37 छात्रों के साथ मौजूद थे। उन्होंने बताया कि रूस से युद्ध शुरू होते ही यूक्रेन के बैंक बंद हो गए। उनके पास उस वक्त पैसे खत्म हो गए थे, जबकि यूक्रेन की प्रिवत बैंक के उनके खाते में 750 डॉलर जमा थे, लेकिन उसे वह निकाल नहीं पा रहे थे। वह जकरपातिया स्टेट में थे, जो यूक्रेन का शांत इलाका माना जाता है, लेकिन युद्ध शुरू होते ही वह अशांत हो गया था। 25 फरवरी को भारतीय दूतावास के कॉन्ट्रेक्टर से उनकी मुलाकात हुई, जिसने उन्हें बस के जरिए हंगरी की सीमा में पहुंचा दिया। इसके बाद भारतीय दूतावास की निगरानी में करीब 400 किलोमीटर की बस यात्रा कर वह बुडापेस्ट हवाई अड्डे पहुंचे, जहां वह बाकी भारतीय साथियों के साथ अपने वतन लौट पाए। मेरी जेब में पैसे नहीं थे, लेकिन मेरा देश मुझे वापस ले आया।