दिल्ली की अदालत ने उपहार अग्निकांड केस में सबूतों से छेड़छाड़ करने के मामले में सुशील अंसल और गोपाल अंसल को सात साल कैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोनों पर 2.25 करोड़ का जुर्माना भी लगाया है।
इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई हैं। यूजर्स तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं। ट्विटर पर एक यूजर्स ने कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्याय मिलने में 24 साल लग गए। यह मामला 1997 में शुरू हुआ था और 2021 में खत्म हुआ। न्याय के स्तर और पूरी व्यवस्था की कल्पना कीजिए।
एक अन्य यूजर ने लिखा कि 2021-1997 = 24 साल। अभी भी चुनौती दी जा सकती है? यही है हमारी न्यायिक व्यवस्था। एक ने ट्वीट किया कि यह एक स्थानीय न्यायालय है और आपके ऊपर दो और न्यायालय है। वकीलों को काम पर रखा जा रहा है बस।
इसी कड़ी में यूजर्स लिखते हैं कि 1997 की घटना है। अपराधी लगभग 25 सालों से आजाद घूम रहे थे और अब सिर्फ सात साल की सजा दे रहे हैं। एक लिखते हैं कि बहुत जल्दी फैसला सुनाया.. इतने दिनों तक कहां सोये थे।
दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिलनी चाहिए
उधर, अदालत ने कहा कि सुशील और गोपाल अंसल ने कानून के शासन की महिमा को कमजोर किया है। उन्होंने न केवल दिल्ली की न्यायपालिका की संस्थागत अखंडता को क्षीण कर दिया, बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रशासन पर भी गंभीर रूप से चोट पहुंचाई है। ऐसे दोषियों के सुधार की संभावना नहीं है। दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिलनी चाहिए। उपहार केस के साक्ष्यों को नष्ट करने के मामले में दोषी ठहराए गए अंसल बंधुओं सहित अन्य की सजा निर्धारण पर दिल्ली पुलिस व पीड़ितों ने अदालत के समक्ष उक्त तर्क रखा।
न्यायालय ऐसे गंभीर अपराध पर आंखें मूंद नहीं सकता
पटियाला हाउस अदालत के मुख्य महानगर दंडाधिकारी पंकज शर्मा के समक्ष उन्होंने कहा सुशील अंसल और गोपाल अंसल नाम के दोषियों से सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। वे मुख्य मामले में भी दोषी ठहराए गए हैं और उनके खिलाफ कई अन्य आपराधिक मामले विचाराधीन हैं। इस मामले ने एक धारणा बनाई है कि अमीर और ताकतवर लोग किसी भी चीज से बच सकते हैं और वे न्यायिक व्यवस्था को अपने पक्ष में कर सकते हैं। अदालत के सम्मान के लिए इस धारणा को भी तोड़ना होगा। न्यायालय ऐसे गंभीर अपराध पर आंखें मूंद नहीं सकता।