डीयू के डॉ. बीआर अंबेडकर कॉलेज में पर्यावरण विज्ञान विभाग में प्रोफेसर डॉ. नागर ने बताया कि जब वह 2001 में मेरठ से एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्हें पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर चिंता हुई। इसके बाद वह पीएचडी करने के लिए दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने 2002 में कुछ लोगों के साथ एक समूह का गठन किया, जो पर्यावरण के लिए काम कर सके।
विकास के युग में पर्यावरण संरक्षण के मायने पीछे रह गए हैं। इसका परिणाम मौसमी दशाओं के माध्यम से दिखना शुरू हो गया है। हालांकि, इन दशाओं की सुध लेते हुए पर्यावरण संरक्षण का जिम्मा उठाया है दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. जितेंद्र नागर ने, जो पिछले 18 साल से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
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डीयू के डॉ. बीआर अंबेडकर कॉलेज में पर्यावरण विज्ञान विभाग में प्रोफेसर डॉ. नागर ने बताया कि जब वह 2001 में मेरठ से एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्हें पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर चिंता हुई। इसके बाद वह पीएचडी करने के लिए दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने 2002 में कुछ लोगों के साथ एक समूह का गठन किया, जो पर्यावरण के लिए काम कर सके।
उस दौर में लोगों को पर्यावरण के बारे में समझाने में थोड़ी परेशानी होती थी क्योंकि उस समय प्रदूषण को लेकर जल्दी कोई नहीं सोचता था। हालांकि, 2004 में प्रोफेसर ने एनवायरोमेंट एंड सोशल डेवलेपमेंट एसोसिएशन की स्थापना की और ऐसे लोगों को जोड़ा जो पर्यावरण में रुचि रखते थे। इसके बाद उन्होंने स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में पौधरोपण जागरूकता अभियान की शुरुआत की। साथ ही पौधे लगाने भी शुरू किए।
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प्रोफेसर अलग-अलग टीमों के माध्मय से 300 से अधिक स्कूलों में बच्चों को पौधरोपण के लिए जागरूक कर चुके हैं। अपने अभियान के दौरान वे बच्चों को जन्मदिन या त्योहार पर पेड़ लगाने के लिए जागरूक करते हैं। साथ ही बच्चों को कम से कम बिजली की इस्तेमाल करने के लिए भी जागरूक किया जाता है। डॉ. नागर कहते हैं कि देश में अधिकांश बिजली का उत्पादन विद्युत ताप केंद्रों में कोयले से होता है। इससे वायु प्रदूषण भी होता है। ऐसे में यदि बच्चों में शुरू से ही बिजली की कम खपत की जागरूकता होगी तो पर्यावरण को भी कम नुकासन पहुंचेगा।
वायु प्रदूषण रोकने के लिए सक्रिय रहता है एक दल
प्रोफेसर ने बताया कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए एक समूह सक्रिय रहता है। समूह के यदि किसी भी व्यक्ति को भी किसी स्थान पर कूड़े जलता हुए मिलता है तो तुरंत इस संबंध में सोशल मीडिया पर जानकारी साझा की जाती है।
2016 में की जल क्रांति मिशन की शुरुआत
डीयू प्रोफेसर जल संरक्षण को लेकर 2016 में जल क्रांति मिशन की भी शुरुआत कर चुके हैं। इसमें तालाबों, नमभूमि व नदियों को बचाने के लिए काम किया जाता है। प्रोफेसर कहते हैं कि यदि हमें नदियों को बचाना है तो सहायक नदियों को भी बचाना होगा। इसके लिए टीम ने यमुना के साथ-साथ इसकी सहायक नदी हिंडन का संरक्षण शुरू कर दिया है। नदी में गंदगी फैलने से रोकने के साथ इसके आसपास हरियाली को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।