आईजीआई एयरपोर्ट पर पहुंचे भारतीय छात्रों ने भविष्य की चुनौतियों से जुड़े सवालों पर हंगरी और पोलैंड से मिले ऑफर का जिक्र किया। छात्रों का कहना है कि भारत सरकार से पहले दूसरे देशों को हमारी चिंता होने लगी। अभी तक भारत सरकार ने हमारी पढ़ाई को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया है, लेकिन हंगरी और पोलैंड के मेडिकल कॉलेज उन्हें अपने यहां पढ़ने के लिए बुला रहे हैं, वह भी बिना किसी शर्त। सबसे अधिक ऑफर उन्हीं छात्रों को मिल रहे हैं जो एमबीबीएस के द्वितीय या फिर तृतीय वर्ष में हैं।
शुक्रवार सुबह यूक्रेन से पहुंचे उत्तर प्रदेश के छात्र हर्ष ने बताया कि हंगरी पहुंचने के बाद ही मोबाइल पर मैसेज मिला। इसमें लिखा था कि अगर स्थानीय मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहते हैं तो उनके लिए यह अच्छा विकल्प हो सकता है। पंजाब के जालंधर निवासी गौरव छाबड़ा ने बताया कि पोलैंड की सीमा में प्रवेश करने के चंद घंटे बाद ही उन्हें ऐसा भी एक मैसेज मिला। छात्रों के व्हाट्सएप ग्रुप में यह मैसेज दौड़ रहा है।
चेन्नई निवासी रिजवान ने बताया कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरते हैं तो भविष्य में ऐसे विकल्प को अपनाने से गुरेज नहीं करेंगे, लेकिन दिल में यह भी दर्द है कि भारत सरकार के किसी प्रतिनिधि ने अभी तक इस विषय पर हमसे कोई चर्चा नहीं की। अभिभावक भी अपने बच्चों की सुरक्षा खासतौर पर लड़कियों के लिए ऐसे विकल्प की तलाश में हैं। दरअसल, विश्व में चिकित्सीय शिक्षा को लेकर चीन के बाद रूस और यूक्रेन दो बड़े हब माने जाते हैं। इन देशों में भारत के मुकाबले एमबीबीएस करना काफी सस्ता पड़ता है।
चीन, रूस और यूक्रेन में 30-35 लाख में हो जाती है एमबीबीएस
भारत के एक प्राइवेट कॉलेज से एमबीबीएस करने में जहां एक से डेढ़ करोड़ रुपये खर्च करना पड़ता है। वहीं, चीन, रूस और यूक्रेन में 30 से 35 लाख रुपये में डिग्री कोर्स हो जाता है। यूक्रेन के बाद हंगरी और पोलैंड भी चिकित्सीय शिक्षा की दौड़ में हैं। यहां भी एमबीबीएस 25 से 30 लाख रुपये में हो जाती है। इन दोनों देशों में मेडिकल यूनिवर्सिटी और कॉलेज 100 वर्ष से भी अधिक समय से डॉक्टर बना रहे हैं।
सस्ती और अच्छी पढ़ाई ने बढ़ाया आकर्षण
यूक्रेन की तरह हंगरी और पोलैंड में भी काफी पुरानी और चर्चित मेडिकल यूनिवर्सिटी हैं। अगर आप दिल्ली से तुलना करें तो यह तीनों देशों में जीवनयापन लगभग एक जैसा ही है। करीब एक महीने में 20 से 22 हजार रुपये का खर्चा होता है, जोकि लगभग दिल्ली के बराबर है। अंतरराष्ट्रीय सीमाएं आपस में सटी होने के कारण भी हंगरी और पोलैंड के पास यह स्वर्णिम काल है।
- डॉ. सुनील कुमार, सदस्य, फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा)
लात-घूंसे भी खाए, फिर भी नहीं मिली एंट्री
हापुड़/गढ़मुक्तेश्वर। यूक्रेन में फंसे जिले के पांच और छात्रों की घर वापसी हो गई है। तमाम दुश्वारियां झेलते हुए पांचों यहां तक पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि पहले पोलैंड बॉर्डर पर पहुंचे थे। वहां दो दिनों तक बॉर्डर पार करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस दौरान पोलैंड की आर्मी ने उनके साथ अभद्रता भी की। उन्हें लात-घूंसे भी मारे। इसके बाद हंगरी के रास्ते आए। अभी भी जिले के छह छात्र फंसे हुए हैं। सबसे चिंताजनक हालात खारकीव में फंसे छात्रों की है।
शुक्रवार को घर लौटा पीरनगर निवासी अभिषेक मावी अभी भी सहमा हुआ है। वह यूक्रेन के लेलिव शहर में फंसा था। युद्ध छिड़ने के बाद हास्टल के साथियों के साथ पोलैंड बार्डर पर जैसे-तैसे पहुंच गया। वहां भारतीय छात्रों को बार्डर पार नहीं करने दिया गया। दो दिन तक केवल चॉकलेट और चिप्स खाकर गुजारा किया। इस दौरान तापमान माइनस पांच डिग्री था। वहां पोलैंड की सेना ने उनको मारा-पीटा भी। एंट्री नहीं मिली तो सभी छात्र दोबारा हॉस्टल लौट आए और हंगरी के रास्ते भारत पहुंचे। गढ़ के गांव नेकनामपुर फुल्ड़ी निवासी आसिफ पुत्र मुस्ताक भी खारकीव से जैसे-तैसे पोलेंड बार्डर पहुंचा। वह भी अभद्रता का शिकार हुआ।
पलवल के दो भाई लौटे
नई दिल्ली। पलवल के रहने वाले चचेरे भाई आलोक और लोकेश भी कीव शहर में फंस गये थे। आलोक बताते हैं कि वह कीव से 28 फरवरी को अपने भाई लोकेश के साथ निकले। कीव से लवीव रेलवे स्टेशन और फिर उझोरोड पहुंचने में मुश्किल आई। घरवालों ने स्लोवाकिया में भारतीय दूतावास से बात कर ली थी। बॉर्डर पर पहुंचने के लिए 500 डॉलर खर्च करने पड़े। टैक्सी वाले मुंह मांगी रकम मांग रहे थे। बॉर्डर के नजदीकी शहर पहुंचने के बाद राहुल से बात हुई और उसकी कार से 15 मिनट के अंदर स्लोवाकिया बॉर्डर पर पहुंच गए। शुक्रवार सुबह परिजनों से मिलकर जान में जान आई। वहीं, पोलैंड और हंगरी बॉर्डर से दिल्ली पहुंचने वाले छात्रों की शुक्रवार को भी यही शिकायत रही कि उनको यूक्रेन में लंबी दूरी तक पैदल चलना पड़ा। बॉर्डर पार करने के लिए भी वह दो-तीन दिन तक इंतजार करते रहे।