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Head of Delhi : दिल्ली में फिर छिड़ेगी अधिकारों की जंग, बन रहे हैं टकराव के आसार

Thu, 28 Jul 2022 06:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) अधिनियम-2021 के प्रभावी होने के बाद दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल हो गया है। गृह मंत्रालय की तरफ से जारी की गई एक अधिसूचना के मुताबिक, इस अधिनियम के प्रावधान 27 अप्रैल 2021 से प्रभावी हो गए हैं।
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असोला भाटी अभयारण्य में निरीक्षण करते उपराज्यपाल वीके सक्सेना, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया file pic - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली में अधिकारों की लड़ाई एक बार फिर तेज होने वाली है। दिल्ली सरकार व राजनिवास के बीच टकराव हो सकता है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) अधिनियम-2021 के प्रभावी होने के बाद दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल हो गया है। 

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गृह मंत्रालय की तरफ से जारी की गई एक अधिसूचना के मुताबिक, इस अधिनियम के प्रावधान 27 अप्रैल 2021 से प्रभावी हो गए हैं। वहीं, राजनिवास के सूत्रों का कहना है कि अधिनियम के लागू होने के 14 महीने बाद भी दिल्ली विधानसभा ने अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों में आवश्यक संशोधन नहीं किया है। यह अभी तक लंबित है। इससे सदन की कमेटियां अनधिकृत क्षेत्राधिकार में जाकर अभी भी काम कर रही हैं। नतीजा संवैधानिक संकट के तौर पर सामने आ रहा है।

उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने इस मसले में दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल को संदेश भेजकर संवैधानिक अनुपालन करने को कहा है। राजनिवास के सूत्रों का कहना है कि उपराज्यपाल दिल्ली के एक अभिभावक के रूप में सेवा कर रहे है। संवैधानिक तरीके से शासन और प्रशासन की समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही संविधान का पालन सुनिश्चित हो इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। इसका उद्देश्य राजनिवास के मुताबिक संविधान के अनुरूप दिल्ली वालों के जीवन में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाना है।
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राजनिवास के सूत्रों का यह भी कहना है कि संशोधन अधिनियम को एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद फिर से संवैधानिक नियम का पालन करने के लिए दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को संदेश भेजा गया है, जिसमें यह भी कहा गया है कि भारत के संविधान की अवमानना हो रही है, इस संदर्भ में जानबूझकर उदासीनता दिखाई जा रही है। उपराज्यपाल ने धारा-9 की उप-धारा (2) के संदर्भ में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से भी विधानसभा अध्यक्ष को अवगत कराया है।

नियम न बदलने से पैदा होगा संवैधानिक संकट : राजनिवास के सूत्रों का कहना है कि संशोधन अधिनियम लागू होने के बाद विधानसभा की नियमावली में बदलाव होना जरूरी है। ऐसा न होने की सूरत में कई बार संसद के अधिनियम और विधानसभा की नियमावली में    टकराव पैदा होता है। अगर किसी विषय को पूरी तरह से उपराज्यपाल के अधिकार में डाल दिया गया है    तो संवैधानिक तौर पर उस पर विधानसभा की कमेटियां दखल    नहीं दे सकतीं, लेकिन अभी विधानसभा की पुरानी नियमावली लागू होने से कमेटियों का गठन    पहले की तरह हो रहा है। इसके साथ दिन-प्रतिदिन के प्रशासनिक मामलों पर विचार करने, प्रशासनिक निर्णय लेने में भी अड़चन बनी हुई है।

ये है मामला
दिल्ली में कोरोना संक्रमण से बिगड़ती स्थिति के बीच केंद्र सरकार ने दिल्ली में जीएनसीटीडी कानून को अमल में लाने की अधिसूचना जारी की थी। गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचना में कहा गया था कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार (संशोधन) अधिनियम-2021, 27 अप्रैल से अधिसूचित की जाती है। अब दिल्ली में सरकार का अर्थ उपराज्यपाल है। यह मामला सुप्रीम    कोर्ट तक पहुंचा था। दिल्ली विधानसभा सत्र के दौरान भी इस मुद्दे पर काफी हंगामा हुआ था।

सत्ता पक्ष ने केंद्र सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाकर संवैधानिक तरीके से चुनी हुई सरकार के अधिकार पर कुठाराघात करना बताया था। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था   कि यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन है। जनता की ताकत की बहाली     के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। कोई भी बाधा आए, अपना अच्छा काम    जारी रखेंगे। काम न तो रुकेगा और न ही धीमा होगा।

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विधानसभा समितियों को खत्म कर देगा अधिनियम

जीएनसीटीडी (संशोधन) अधिनियम, 2021 पर दिल्ली विधानसभा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस संशोधन से विधानसभा की समिति प्रणाली ही निष्क्रिय हो जाएगी। यह संशोधन विधानसभा और उसकी समितियों को प्रशासनिक निर्णयों की जांच करने से रोकता है। अधिनियम में संशोधन को दिल्ली सरकार ने भी चुनौती दी है। सरकार का मानना है कि यह संशोधन अनुच्छेद  239 एए का उल्लंघन करता है।  

दिल्ली विधानसभा की तरफ से जारी प्रतिक्रिया में यह भी सवाल उठाया गया कि संशोधन लागू होने के बाद विधानसभा की समितियां क्या देखेंगी। समितियों के कार्यों का हवाला देते हुए बताया कि विधायिका की समितियां प्रशासनिक निर्णयों को देखती हैं। समितियों द्वारा दोषी पाए जाने पर व्यक्तिगत अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाती है। यह भी कहा गया कि हाल में ही याचिका समिति और विशेषाधिकार समिति ने विभिन्न मामलों में एसडीएम और एडीएम के आदेशों की जांच की है। इसी जांच की वजह से चार एसडीएम, दो एडीएम, एक सब रजिस्ट्रार और कुछ अन्य अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। 

विधानसभा की तरफ से यह भी बताया गया कि विधायिका की समितियां संवैधानिक हैं। विधायिका इन समितियों के माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही तय करती है। अनुच्छेद 239 एए के तहत कार्यपालिका विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। संसद संशोधन के माध्यम से विधायिका के इस मौलिक कार्य को नहीं छीन सकती है। इस संशोधन के माध्यम से यही किया  गया है। पीएसी, पीयू, एससीएसटी समिति, ओबीसी कल्याण समिति प्रशासनिक निर्णयों पर गहराई से विचार करती हैं। ये समितियां ऐसे कार्य करती हैं, जो हमारी संवैधानिक योजना में आवश्यक हैं। उपराज्यपाल जिस संशोधन को लागू करना चाहते हैं, वह समितियों को प्रभावी ढंग से समाप्त कर देगा। 
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