नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सम्मान मिलना अच्छी बात है, लेकिन उनको जितना भी सम्मान मिला है और मिलता रहेगा, वह कम है। उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना सब कुछ ही न्यौछावर नहीं किया, बल्कि वह दुनिया के ऐसे पहले योद्धा है जिन्होंने विदेश में जाकर देश को आजाद कराने का बीड़ा उठाया। इस कारण वह समस्त सम्मानों से बहुत ऊपर है। यह बातें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के दिवंगत कैप्टन एसएस यादव के पुत्र डा. अनिल यादव ने व्यक्त की।
अमर उजाला के साथ अपने पिता कैप्टन एसएस यादव से नेताजी सुभाष चंद्र बोस, उनके देश को आजाद कराने के प्रयास एवं आजाद हिंद फौज की लड़ाई की सुनी बातें साझा करते हुए डा. अनिल यादव ने बताया कि नेताजी को उनके साथी उन्हें भगवान के अवतार की तरह मानते थे। वह दुश्मन के हमले की परवाह किए बिना मोर्चे पर सैनिकों का हौंसला बढ़ाने पहुंचते थे।
इस कारण सैनिक कई गुना जोश के साथ देश को आजाद कराने की लड़ाई लड़ने में जुट जाते थे। वह देश को आजाद कराने की लड़ाई में शामिल होने के लिए ऐसे जोश एवं उत्साह के साथ जाते थे, जैसे बेटे की बारात लेकर पिता जाता है। इसके अलावा जब भी आजाद हिंद फौज का मुख्य गीत कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा... गाया जाता था तो तमाम सैनिक स्वयं को झूमने से रोक नहीं पाते थे। उनको यह गीत बहुत प्यारा ही नहीं, बल्कि जोश भरने वाला लगता था।
वह बताते है कि आजाद हिंद फौज के सैनिक नेताजी सुभाष चंद बोस के बहुत बड़े दिवाने थे। वे देश आजाद होने के बाद अंतिम सांस तक उन्हें सम्मान दिलाने में जुटे रहे। उन्होंने नेताजी को सम्मान और सैनिकों को हक दिलाने के लिए ऑल इंडिया आईएनए कमेटी का गठन किया। इस कमेटी के अंत उनके पिता महासचिव रहे। उनके पिता का स्वर्गवास करीब पांच साल पहले 95 साल की आयु में हुआ।
कमेटी ने सर्वप्रथम नेताजी की जयंती पर विख्यात कार्यक्रम आयोजित करने की मांग शुरू की थी। इसके अलावा कमेटी उनकी जयंती को देशभक्ति दिवस घोषित करने की मांग करती रही। कमेटी चाहती थी कि इंडिया गेट परिसर में बनी छतरी के नीचे नेताजी की मूर्ति स्थापित की जाए और अंडबार एवं निकोबार का नाम शहीद एवं स्वराज रखा जाए। ये दोनों जगह आजाद हिंद फौज से जुड़ी हुई है और नेताजी ने इनका नाम शहीद एव स्वराज रखा था।