चाय की चुस्कियों के बीच चर्चा में मशगूल पांच-सात युवा। संजदगी ऐसी, जैसे आपस का कोई बड़ा मसला सुलझा रहे हों। गौर करने पर माजरा दूसरा ही समझ में आया। बात वहां यूक्रेन संकट की हो रही थी। इन लोगों के आपस में दो ग्रुप बने हुए थे। एक रूस के हमले को जायज ठहरा रहा था, दूसरा इसे विश्व व्यवस्था को तोड़ने वाला कदम बता रहा था। सबकी अपनी-अपनी दलील थी। बीच-बीच में भारत के रुख पर भी सवाल उठाया जा रहा था।
तस्वीर यूक्रेन संकट से बच्चों को निकालने में लगे किसी सरकारी दफ्तर नहीं, ओल्ड राजेंद्र नगर में फुटपाथ की है। यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा यूक्रेन संकट पर बहस में मशगूल थे। ऐसी चर्चा अपवाद भी नहीं, देश में चल रही समसामयिक घटनाओं से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम के रिवीजन तक चाय की चुस्कियों में पूरा हो जाता है। साथ ही आशा और निराशा की कहानियां सुनने के लिए भी यहां जमघट देखने को मिल जाएगा।
कोचिंग इलाकों में चाय पर चर्चा के लिए कई प्रमुख केंद्र बने हुए हैं, जहां सुबह की पहली चाय से लेकर रात की आखिरी चाय की चुस्कियों पर चर्चा चलती हैं। इन्हीं चुस्कियों के साथ पूरे दिन का शेड्यूल तैयार किया जाता है, जिसमें कोचिंग की पढ़ाई से लेकर घर की सफाई तक शामिल होती है। चाय स्टॉल के संचालक बताते हैं कि बच्चे दिनभर पढ़ाई की थकावट मिटाने के लिए अक्सर चाय की दुकानों, ठेलों और रेस्तरां का रुख करते हैं। छात्रों का जमघट लगने पर दुनिया भर में चल रही घटनाओं पर चर्चा का दौर भी शुरू हो जाता है।
कुल्हड़ से लेकर कप के साथ बीत जाते हैं 15 से 30 मिनट
चाय दुकानदार बताते हैं कि अक्सर छात्र बड़े कप लेकर चाय पर चर्चा करना पसंद करते हैं। वहीं, कुछ छात्रों को कुल्हड़ वाली चाय भी पसंद है। ऐसे में चाय के एक कप के साथ 15 से 30 मिनट तक चर्चाओं का दौर चलता है। कई बार चर्चा लंबी होने पर अधिक समय तक रुकने के लिए दोबारा चाय को लेकर आधार बनाया जाता है। छात्रों की जेब का ध्यान रखते हुए यहां चाय का दाम भी छह रुपये से लेकर 20 रुपये तक रखा गया है।
मैं यहां प्रतिदिन चाय पीने पहुंचता हूं। चाय के साथ-साथ अन्य छात्रों से कोचिंग में पढ़ाया गया रिविजन भी हो जाता है। इससे समय की भी बचत हो जाती है। प्रतिदिन सुबह से रात तक तीन से चार बार चाय पी लेता हूं।
-सुशील, ओडिसा
मानसिक थकान मिटाने के लिए चाय का बहुत सहारा है। सुबह की शुरुआत से रात का अंत चाय की दुकानों पर ही हो जाता है। इस दौरान अलग-अलग छात्रों के साथ विभिन्न मुद्दों को लेकर चर्चाएं भी हो जाती हैं। साथ ही सफलता और असफलता की कहानियां भी सुनने को मिलती हैं।
- निखील पाटिल, महाराष्ट्र