दिल्ली में हर साल पुरुषों की तुलना में महिलाएं सबसे अधिक नसबंदी कराती हैं लेकिन बीते दो वर्ष में कोरोना महामारी की वजह से न सिर्फ नसबंदी के मामलों में भारी गिरावट आई है
बल्कि नसबंदी कराने वाले पुरुषों की संख्या पहले की तुलना में और कम हुई। साल 2020 के दौरान जब महामारी के चलते छह महीने का लॉकडाउन लगा, तो उस दौरान पुरुष घरों में रहे लेकिन नसबंदी के लिए महिलाएं अस्पताल पहुंचीं।
यह खुलासा दिल्ली के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की एक रिपोर्ट में हुआ है, जिसके अनुसार कोरोना महामारी की वजह से दिल्ली में साल 2020-21 के दौरान दो तिहाई से भी अधिक नसबंदी में कमी दर्ज की गई है। गौर करने वाली बात ये है कि इस अवधि में केवल 78 पुरुष ही घरों से बाहर निकल नसबंदी के लिए अस्पताल पहुंचे।
इसी दौरान पुरुषों की तुलना में 7,884 महिलाओं ने नसबंदी कराई। नई दिल्ली स्थित प्रोत्साहन फाउंडेशन की सोनल कपूर ने कहा कि यह रिपोर्ट दिल्ली जैसे महानगर की जमीनी हकीकत बयां कर रही है।
उन्होंने कहा कि हर साल दिल्ली में नसबंदी को लेकर पुरुषों की संख्या कम रहती है। इसके पीछे कई तरह की मानसिकताएं भी हैं कि नसबंदी कराने की जरूरत महिलाओं को होती है, जबकि पुरुष उन मानसिकताओं की आड़ लेते हुए खुद को इससे दूर रखते हैं। वे घर में रहना पसंद करते हैं और महिलाओं को नसबंदी के लिए अस्पताल भेजते हैं।
वह बताती हैं कि साल 1970 में परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत हुई, तब से लेकर अब तक दिल्ली सहित पूरे देश में आबादी नियंत्रण के लिए महिलाओं पर ध्यान दिया जाता है जबकि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की नसबंदी आसान है।
क्या कहती है रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019-20 में पुरुषों और महिलाओं को मिलाकर 18,392 लोगों की नसबंदी की गई थी, जबकि 2020-21 में महज 7,884 लोगों ने ही नसबंदी करवाई। इससे पता चलता है कि कोरोना की वजह से दिल्ली में नसबंदी के आंकड़ों में 43 फीसदी की कमी आई है। वहीं बीते सात वर्षों की स्थिति देखें तो महिलाओं की संख्या नसबंदी करवाने वाले पुरुषों से कहीं ज्यादा रही। साल 2019-20 में जहां 740 पुरुषों ने नसबंदी करवाई थी वहीं साल 2020-21 में केवल 78 पुरुष ही नसबंदी के लिए अस्पतालों तक पहुंचे।
चिकित्सीय प्रक्रिया दर्द रहित और कुछ ही घंटों तक सिमटी
दिल्ली सरकार के लोकनायक अस्पताल की डॉ. सीमा बताती हैं कि पुरुष नसबंदी एक सामान्य सा ऑपरेशन है जिसके जरिये शुक्राणु को निकलने से रोका जाता है। इसी तरह महिलाओं की नसबंदी भी की जाती है लेकिन वर्तमान में कई अत्याधुनिक तकनीक आने के बाद यह चिकित्सीय प्रक्रिया न सिर्फ दर्द रहित बल्कि कुछ ही घंटों तक रहकर सिमट गई है। ऑपरेशन का मतलब कोई चीरा लगना नहीं है, इससे मरीजों का फायदा होता है लेकिन वे रोजाना अपने यहां देखती हैं कि महिलाएं ही सबसे अधिक नसबंदी के लिए अस्पताल आती हैं।
सात साल की स्थिति
साल पुरुष महिलाएं कुल
2014-15 811 16,647 17,458
2015-16 901 16,482 17,383
2016-17 1,323 17,546 18,869
2017-18 491 16,513 17,004
2018-19 499 17,032 17,531
2019-20 740 17,652 18,392
2020-21 78 7,806 7,884