दिल्ली एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि इनमें से एक मरीज को दिल्ली के ही एक प्राइवेट अस्पताल से रेफर किया था। मरीज की हालत काफी नाजुक थी और कोई भी एंटी इन्फेक्शन दवाओं का असर नहीं हो रहा था। दोनों ही मरीज को ब्लैक फंगस इत्यादि में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी दी गईं लेकिन जब यह भी बेअसर रहीं तब डॉक्टरों की टीम ने एनआईवी पुणे स्थित लैब में जांच कराई और इस दौरान डब्ल्यूएचओ से भी जानकारी ली गई। डॉक्टरों ने बताया कि हफ्ते भर बाद मरीजों की मल्टी-ऑर्गन फेल्योर की वजह से मौत हो गई।
डब्ल्यूएचओ से डॉ अरुणलोक चक्रवर्ती ने बताया कि एक दशक पहले तक दुनिया भर में फंगस के करीब 300 से स्ट्रेन का पता लग चुका था लेकिन अब फंगस के 700 से ज्यादा स्ट्रेन हैं। यह इंसानों को बीमार करते हैं और कई फंगस पर दवाओं का भी असर नहीं होती।
डॉक्टरों का कहना है कि इस स्थिति से बचने के लिए सबसे पहले फंगस संक्रमण से बचना जरूरी है। एंटीबायोटिक्स और स्टेरॉयड युक्त दवाओं का इस्तेमाल खुद से न करें। मधुमेह, किडनी की बीमारी या अन्य किसी बीमारी से ग्रस्त लोगों को समय पर दवाएं लेने के साथ ही खान-पान का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।