सच्चा प्यार हो या संगीत की सरिता...इनके सामने सरहदों की दूरियां भी मिट जाती हैं। बात भारतीय पारंपरिक संगीत की हो तो बात ही कुछ और है। हालांकि, आधुनिकता की चकाचौंध में पारंपरिक वाद्ययंत्र अपनी पहचान खो रहे हैं, लेकिन अब वह दिन दूर नहीं है जब प्राचीन ‘स्वरगंगा’ एक बार फिर दुनियाभर में संगीत प्रेमियों को सराबोर करेगी।
कई दुर्लभ वाद्ययंत्रों का अविष्कार करने वाले कलाकारों की नई पीढ़ियों ने अपने पूर्वजों की विरासत को संजोने का बीड़ा उठाया है। राष्ट्रीय राजधानी की संगीत नाटक अकादमी स्थित ज्योतिर्गमय आर्ट गैलरी में नई पीढ़ियां दुर्लभ लोक संगीत वाद्ययंत्रों को बनाने का प्रशिक्षण देने में जुटीं हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग सात सुरों के संगम में गोते लगा सकें। उनका दावा है कि वह इसमें सफल जरूर होंगे।
परदादा ने किया नादसुरम का अविष्कार
तमिलनाडु के कलाकार एस सतीश के परदादा सिलवाराज ने 1947 में नादसुरम का अविष्कार किया। अब उनके परपौत्र ये काम कर रहे हैं। सतीश ने बताया कि नादसुरम को 148 देशों में जियोग्राफिकल पहचान हासिल है। यह शहनाई के जैसा एक वाद्ययंत्र है। नादसुरम को बनाने में तीन-चार दिन का समय लगता है।
कलाकार दे रहे हैं प्रशिक्षण
21 जून को विश्व संगीत दिवस था, जिसके उपलक्ष्य में कार्यशाला आयोजित की गई। यहां तमिलनाडु के कलाकारों ने नादसुरम बनाना सिखाया, जबकि दिल्लीवालों ने तबला बनाने का प्रशिक्षण दिया। जम्मू-कश्मीर के कलाकारों ने कश्मीरी रबाब और उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोगों ने सारंगी बनाकर हर किसी का मन मोह लिया। गुजरात के कलाकारों ने तानपुरा, पश्चिम बंगाल के कलाकारों ने सरोद और महाराष्ट्र, केरल, मणिपुर, मेघालय व राजस्थान के कलाकारों ने अपने लोक संगीत वाद्ययंत्रों को बनाकर दिखाए।
हफ्तेभर में बनाते हैं सिंधी सारंगी
राजस्थान के कलाकार शिकंदर शफू खां ने बताया कि उनका परिवार परंपरागत तरीके से सिंधी सारंगी बनाने का काम कर रहा है। कार्यशाला में आए लोगों को उन्होंने सारंगी बनाने की बारीकियां सिखाईं।
छठीं पीढ़ी भी बना रही कश्मीरी रबाब
कश्मीर के बारामूला जिले से आए सब्बीर रमन भट्ट और उनका पूरा परिवार कश्मीरी रबाब बनाने के काम जुटा है। इनके भाई अहमद भट्ट रबाब बजाना सिखाते हैं। उन्होंने बताया कि रबाब को शहतूत की लकड़ी से बनाते हैं। इसे बनाने में करीब छह महीने का समय लगता है। एक रबाब को बनाने में करीब पांच हजार रुपये की लागत आती है। इसकी कीमत 25 हजार रुपये होती है।
आठवीं पीढ़ी बना रही है तानपुरा
महाराष्ट्र के कलाकार फारुख अब्दुल्ला ने बताया कि उनका परिवार परंपरागत तरीके से तानपुरा का निर्माण कर रहा है। वह आठवीं पीढ़ी के कलाकार हैं। कद्दू और लकड़ी की छिलाई, घिसाई कर करीब हफ्ते भर में तानपुरा बनाते हैं। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग आकार का तानपुरा बनता है। इसकी कीमत 20-27 हजार रुपये तक होती है।