एमसीडी जब एकीकृत थी, तब स्थायी समिति के नेता का पद काफी पॉवरफुल होता था। कांग्रेस के दिग्गज नेता राम बाबू शर्मा जब एकीकृत एमसीडी स्थायी समिति के अध्यक्ष थे तो वे न तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना और न ही अपनी ही पार्टी की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कम अधिकार रखते थे। इसी तरह भाजपा के मेयर शांति देसाई का कद भी तत्कालीन दिल्ली के मुख्यमंत्री से कम नहीं होता था।
एकीकृत एमसीडी होने के बाद केंद्र सरकार की योजनाओं को भी लागू कराने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि योजना, प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, आयुष्मान भारत योजना को दिल्ली में भी लागू करने में परेशानी नहीं होगी। इन योजनाओं से भाजपा को एक बड़े वोट बैंक पर कब्जा होने की उम्मीद भी है।
सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2007 में एकीकृत नगर निगम और उसके बाद वर्ष 2012 व 2017 में तीनों नगर निगमों के चुनाव में भारी जीत हासिल करने वाली भाजपा के नेताओं को डर इस बात का भी है कि इस बार जीत मुश्किल न हो जाए। इसकी बड़ी वजह 15 साल की सत्ता के विरोध की लहर मानी जा रही है। अब अगर भाजपा एमसीडी चुनाव हारती है तो निगम के नेताओं के साथ भाजपा के सातों सांसदों की कार्यशैली पर भी सवाल उठेंगे।
सूत्रों के मुताबिक, इसी कड़ी में सांसदों समेत प्रदेश भाजपा नेताओं ने केंद्रीय मंत्री अमित शाह को तीनों नगर निगम का विलय करने का सुझाव दिया है। वह नगर निगम के वार्डों की संख्या 272 से कम करके 136 करने की भी वकालत कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह निर्णय लेने की स्थिति में सत्ता विरोधी लहर को बेअसर किया जा सकता है।