कारगिल में तोलोलिंग चोटी पर 22 साल पहले पाकिस्तानी घुसपैठियों के छक्के छुड़ाने के दौरान घायल हुए दो राजपूताना राइफल्स के जांबाज लांस नायक (सेवानिवृत) सतबीर सिंह के समक्ष आज घर चलाने का संकट पैदा हो गया है। सेना से मिलने वाली पेंशन कम पड़ने पर उनको घर चलाने के लिए अपने एक बेटे को पढ़ाने के बजाए उससे निजी कंपनी में ड्राइवर की नौकरी करानी पड़ रही है। कोरोना महामारी के कारण उनकी जूस की दुकान बंद हो गई है।
दिल्ली देहात के मुखमेलपुर गांव निवासी सतबीर सिंह कहते है कि निरंतर महंगाई बढ़ रही है और महंगाई को देखते हुए सेना से मिलने वाली पेंशन काफी कम है। उन्होंने पेंशन से गुजारा नहीं होने पर कई साल पहले अपने गांव में ही जूस की दुकान खोली थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण उनकी दुकान बंद हो गई है। उनका कहना है कि कोरोना महामारी के कारण गत सवा साल के दौरान दो बार लॉकडाउन होने पर उन्हें काफी दिनों तक दुकान बंद करनी पड़ी। इसके अलावा अनलॉक आरंभ होने पर उन्होंने जब दुकान खोली तो कोरोना महामारी के कारण ग्राहक कम आए। इस कारण उनके समक्ष दुकान का किराया देने के लाले पड़ गए।
वह बताते है कि अब घर चलाने के लिए उन्होंने अपने एक बेटे से एक कंपनी में ड्राइवर की नौकरी करानी आरंभ की है, क्योंकि सेना से मिलने वाली पेंशन से परिवार का गुजारा नहीं हो रहा है। वह अपने दूसरे बेटे को पढ़ा रहे है। वह बताते है कि कारगिल युद्ध के बाद वह सेवानिवृत कर दिए गए, लेकिन उनको पूरी पेंशन नहीं दी गई। वह काफी वर्षों तक इस संबंध में लड़ाई लड़ते है। उनके संबंध में चार साल पहले संसद में मुद्दा उठने के बाद उन्हें पूरी पेंशन मिलनी शुरू हुई, लेकिन उन्हें पेंशन की बकाया राशि पूरी नहीं मिली है। उनकी अपेक्षा एवं संघर्ष देखकर उनके दोनों बेटों ने सेना में जाने से मना कर दिया।
कारगिल युद्ध में घायल होने के बाद सतबीर सिंह को सबसे पहले कश्मीर स्थित सेना के अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन दो दिन बाद उन्हें वहां से दिल्ली छावनी स्थित बेस अस्पताल में भेजा गया। उनके पैर में कई गोली लगी होने पर उन्हें आरआर अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया था। वहां वह कई माह तक भर्ती रहे।