अदालत ने कहा कि चिकित्सा विशेषज्ञ को ऐसे समय में नियुक्त किया गया था जब नाबालिग बेटे का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। लेकिन यह स्थिति आज नहीं है। ऐसे में 80 हजार रुपये का वेतन ज्यादा है।
उच्च न्यायालय ने इकलौते बेटे की देखभाल के लिए नियुक्त चिकित्सा विशेषज्ञ को वेतन नहीं देने पर पति के खिलाफ अदालत की अवमानना कार्रवाई करने से इनकार कर दिया।
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अदालत ने कहा कि चिकित्सा विशेषज्ञ को ऐसे समय में नियुक्त किया गया था जब नाबालिग बेटे का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। लेकिन यह स्थिति आज नहीं है। ऐसे में 80 हजार रुपये का वेतन ज्यादा है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनके सामने यह विवाद इस बात तक सीमित है कि वेतन का भुगतान न करना अवमानना होगा या नहीं। कोर्ट ने कहा कि यह फैमिली कोर्ट के आदेश की व्याख्या का मामला होगा।
अदालत ने कहा बदली हुई परिस्थितियों के मद्देनजर उनका मानना है कि वेतन की 80,000 राशि अत्यधिक अधिक है, जिसे एक बच्चे की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया है। पत्नी ने याचिका में आरोप लगाया था कि पति निचली अदालत के आदेश के पालन करने में असफल रहा है। 9 नवंबर 2021 को दिए आदेश में पति को अपार्टमेंट के किराए के रूप में 4.25 लाख का भुगतान करने के साथ-साथ पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए रखरखाव के रूप में 1 लाख और दैनिक किराने का सामान के लिए 1 लाख का भुगतान करने के लिए कहा गया था।