उच्च न्यायालय ने मंगलवार को भगोड़े संत वीरेंद्र देव दीक्षित के आश्रम के कामकाज पर हैरानी व्यक्त की, जहां कथित तौर पर 160 से अधिक महिलाओं के आमानवीय और पशु जैसी परिस्थितियों में रहने का आरोप है। अदालत ने कहा आश्रम को दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए और वे जल्द ही इस संबंध में आदेश पारित करेंगे।
अदालत ने कहा कि आखिर देव दीक्षित की अनुपस्थिति में आश्रम को चला कौन रहा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह की सुविधा के अस्तित्व को बकवास बताते हुए कहा वहां निश्चित रूप से कुछ चल रहा था। पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया उनका विचार है कि आश्रम को दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा अपने कब्जे में ले लिया जाए। पीठ ने यह निर्देश आश्रम में रहने वाली एक महिला के माता-पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि माता-पिता अपनी बेटी से मिलना चाहते थे, जो गंभीर पीठ दर्द से पीड़ित है, लेकिन उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा रही थी। गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि आश्रम दीक्षित के स्वामित्व में है, जिस पर सीबीआई ने आरोप पत्र दायर किया है और उसके खिलाफ कम से कम 10 मामले लंबित हैं। उन्होंने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल और अधिवक्ता नंदिता राव द्वारा पेश रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि रिपोर्ट में पता चलता है कि आश्रम में महिलाएं कैदी व जानवरों जैसी परिस्थितियों में रह रही हैं। इनमें कुछ नाबालिग प्रतीत हो रही हैं।
याचिकाकर्ता की बेटी की ओर से पेश वकील ने कहा कि आश्रम दीक्षित के स्वामित्व में नहीं है और सामूहिक रूप से वहां रहे लोगों द्वारा चलाया जा रहा है। उच्च न्यायालय को बताया गया कि अखिल भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान (एम्स) और मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान (आईएचबीएएस) के डॉक्टरों की एक टीम ने उसके आदेश पर सुविधा का दौरा किया था और कुछ भी गलत नहीं पाया। पीठ ने कहा कि आश्रम में कुछ गड़बड़ है। यह स्वीकार करना मुश्किल है कि संस्था के सदस्य पूरी तरह से होश में हैं या वे अपनी मर्जी से रह रहे हैं न कि किसी जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव में। पीठ ने कहा कि संस्था कारण बताएं कि हमें संस्था के अधिग्रहण का निर्देश देने के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ना चाहिए।
याची के अधिवक्ता ने आशंका जताई कि आश्रम की महिलाओं को अदालत के सख्त दृष्टिकोण के बाद स्थानांतरित किया जा सकता है। अदालत ने उनकी आशंका को देखते हुए जिला पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि इस बीच महिलाओं को आश्रम से बाहर नहीं निकाला जाए। पीठ ने याचिकाकर्ता को सुनवाई की अगली तारीख से पहले अपनी बेटी से मिलने की अनुमति दी। दिल्ली पुलिस को माता-पिता को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने और बैठक की सुविधा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने मामले की सुनवाई गुरुवार तय की है।
वीरेंद्र देव दीक्षित ब्रह्मा कुमारियों के अनुयायी थे, जिन्होंने बाद में आध्यात्मिक विश्व विद्यालय नाम से अपना स्वयं का संगठन स्थापित किया।
दीक्षित पर दिल्ली के रोहिणी इलाके में अपने किले जैसे आश्रम में 100 से अधिक महिलाओं को बंधक बनाने और उनका यौन शोषण करने का आरोप है। बाबा और उनका आश्रम दिसंबर 2018 में सुर्खियों में आया जब दिल्ली पुलिस ने परिसर से 40 से अधिक महिलाओं को बचाया। तब से दीक्षित फरार है। इस मामले की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर रही है।