उन्होंने कहा यह एफआईआर एक पकी हुई यानि पहले से तैयार थ्योरी है। क्या लोगों पर मुकदमा चलाना इतना आसान है? क्या अभियोजन के रूप में आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर फंसाया गया है। पुलिस ने दंगो के मामले में 715 मामले दर्ज किए हैं, लेकिन एक भी मामले में उनके मुवक्किल का नाम तक नहीं है।
उन्होंने अदालत से कहा कि यूएपीए एफआईआर अनावश्यक है और सीएए के विरोध के आधार पर लोगों को चुनिंदा निशाना बनाने के लिए इसका मसौदा तैयार किया गया है और अदालत में दायर किया गया है। पाइस ने अदालत को बताया कि दंगों की प्रत्येक प्राथमिकी में एक संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है, हालांकि मौजूदा एफआईआर में ऐसी कोई बात नहीं है।
उन्होंने कहा कि आरोपपत्र को फर्जी तरीके से बनाया गया है और चुनिंदा गवाहों को उनके मुवक्किल के खिलाफ बोलने के लिए तैयार किया गया है। यह एफआईआर खोखली है और इसमें हास्यास्पद बयान दिए गए हैं। ऐसे में उनके मुवक्किल की जमानत स्वीकार की जाय। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर तय की है।
दिल्ली पुलिस ने हाल ही में जमानत आवेदन पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि वर्तमान में याचिका स्वीकार योग्य नहीं है। उन्होंने आरोपपत्र का हवाला देते हुए कहा था कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य सामने आए हैं।
अप्रैल में जेएनयू के पूर्व छात्र को दंगे के एक मामले में जमानत दे दी गई थी। अदालत ने उसे जमानत देते समय कहा था कि आरोपी घटना की तारीख को घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। उनके अलावा जेएनयू की छात्राएं नताशा नरवाल और देवांगना कलिता, जामिया समन्वय समिति के सदस्य सफूरा जरगर, आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और कई अन्य लोगों पर भी इस मामले में कड़े कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।