हाईकोर्ट ने ईसाई दंपती को उस छह साल की बच्ची का पालक माता पिता घोषित किया है जिसे उन्होंने जन्म के समय गलती से हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटीनेंस एक्ट में गोद लिया था। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि दंपती ने बच्ची की अच्छी तरह देखभाल की है।
कोर्ट ने गौर किया कि चूंकि बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया में जूवेनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है। इसलिए बच्ची को अमेरिका ले जाने के लिए जरूरी एनओसी जारी न करने के मामले में सेंट्रल एडॉप्शन रिसोस अथॉरिटी (सीएआरए) को गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बच्चा वैध रूप से गोद नहीं लिया गया।
हालांकि कोर्ट ने सारी बातों पर गौर करने के बाद सीएआरए को दंपती को एनओसी तथा केंद्र सरकार को बच्ची का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि एनआरआई और ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) से संबंधित जेजे एक्ट के प्रावधान के पालन के लिए जोर नहीं डालेगा।
न्यायमूर्ति आशा मेनन ने अपने हालिया फैसले में कहा कि सीएआरए ये सुनिश्चित करेगा कि दो साल तक उसके द्वारा अधिकृत एजेंसी तिमाही और छमाही अंतराल पर होम स्टडी रिपोर्ट उसे सौंपेगी। इसके साथ ही उन्होंने दंपती को लिखित आश्वासन देने के लिए कहा कि वे बच्ची का पालन-पोषण अपनी बच्ची की तरह करेंगे और उसकी शिक्षा व विकास के अवसर प्रदान करेंगे। इसके साथ ही वह उसकी स्वास्थ्य जरूरतों का ख्याल रखेंगे। इसके साथ ही वह अपनी दत्तक बेटी के अमेरिका नागरिकता भी हासिल करेंगे।
हाईकोर्ट ने ये फैसला उस ईसाई दंपती की याचिका पर सुनाया है जिन्होंने खुद को बच्ची का पालक माता पिता घोषित करते हुए उन्हें बच्ची को अमेरिका ले जाने के लिए अनिवार्य एनओसी जारी करने का निर्देश सीएआरए को देने का आग्रह किया था। इसके साथ उन्होंने उनके नाम का जिक्र माता पिता के तौर पर करते हुए बच्ची का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश केंद्र सरकार को देने का भी आग्रह किया था।
अदालत ने पत्नी को तीन तलाक देने के आरोपी शख्स को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि इस तुरंत की तलाक देने की प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं को कभी भी घर से निकाले जाने का डर सताता रहता है।
मामले में आरोपी शराफत हुसैन ने अपनी पत्नी को फोन पर तीन तलाक दिया था। इसके बाद पत्नी ने उसके खिलाफ 2019 में संबंधित कानून में मुकदमा करवाया था।
तीस हजारी अदालत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाएं सालों से घर से निकाले जाने के डर में जी रही है। अगर उनका पति सालों पुरानी शादी को तीन तलाक कहकर तोड़ने का फैसला कर लेता है।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपी की पत्नी ने अपने मोबाइल में उस बातचीत को रिकार्ड और सेव किया हुआ है जिसमें पति ने उसे तीन तलाक दिया था। अदालत ने कहा रिकार्डिंग पर विशेषज्ञों की रात जानने के लिए आरोपी के आवाज के नमूने लेने जरूरी हैं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में वह आरोपी को जमानत देने की इच्छुक नहीं हैं। ये बात उन्होंने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए 30 जुलाई के अपने फैसले में कही।
याचिका पर सुनवाई के दौरान पीड़िता ने कहा कि आरोपी उसका व उसके डेढ़ माह के बच्चे का खर्च नहीं दे रहा है और उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। वहीं आरोपी के वकील माधव चौधरी ने कहा कि उनके मुवक्किल ने कभी अपनी पत्नी को तलाक नहीं दिया और वह अपनी गृहस्थी को बचाना चाहता है। वकील ने कहा इस शादी को बचाया जा सकता है, अगर पीड़िता अपने पति के साथ रहने के लिए तैयार है।
दूसरी ओर सरकारी वकील ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अगर आरोपी को जमानत दी जाती है तो वह 24 अगस्त 2021 को पुलिस को अपनी आवाज के नमूने नहीं देगा।