मुंडका गांव में हुए अग्निकांड में अब तक 27 लोगों की जानें जा चुकी हैं और कई अभी भी लापता हैं। हादसे के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? हादसे के बाद हमेशा की तरह सभी विभाग एक-दूसरे पर आरोप मढ़ रहे हैं। दमकल विभाग का कहना है कि एमसीडी की सूचना के बाद ही इमारत में एनओसी देने की प्रक्रिया होती है।
चूंकि, बिल्डिंग को अवैध रूप से बनाया गया था, इसलिए वहां आग से बचाव के भी कोई इंतजाम नहीं किए गए थे। वहीं, छानबीन के दौरान पुलिस को पता चला है कि लाल डोरे में बनी इस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियों के लिए दिल्ली नगर निगम की ओर से कोई लाइसेंस भी जारी नहीं किया गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसकी मिलीभगत से इमारत में इतने बड़े पैमाने पर लोगों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।
मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि मुंडका गांव में मुख्य मार्ग पर मेट्रो स्टेशन के नीचे करीब 500 गज के प्लॉट पर इमारत का निर्माण किया गया है। इमारत के मालिक मनीष लाकड़ा ने यहां बेसमेंट के अलावा अपर ग्राउंड फ्लोर पर दुकानें बनाई हैं। इसके अलावा पहली, दूसरी और तीसरी मंजिल पर निर्माण किया गया है। तीनों ही फ्लोर को सीसीटीवी कैमरे और वाईफाई राउटर असेंबल करने वाली कंपनी को किराए पर दिया हुआ है।
चौथी मंजिल के आधे हिस्से पर इमारत के मालिक मनीष लाकड़ा ने अपने रहने के लिए मकान बना रखा है। बिना नक्शे के बनी बिल्डिंग में ऊपर आने-जाने के लिए इमारत के पीछे की ओर दूसरी गली से करीब तीन फुट का एक पतली सी सीढ़िया बनी हुई हैं। इसके अलावा एक छोटी लिफ्ट भी लगी है। सीसीटीवी और राउटर बनाने वाली कंपनी के मालिक हरीश गोयल व वरुण गोयल ने पावर बैकअप के लिए पहली मंजिल की सीढ़ियों पर ही जेनरेटर रखा हुआ था। ऐसे में वहां से निकलने का रास्ता और भी तंग था। इमारत में एक समय में 150 से अधिक लोग काम करते थे।
इलाके में इस तरह की कई इमारतें
दमकल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यदि इमारत में दो सीढ़ियां बनी होती तो शायद हादसा इतना बड़ा नहीं होता। दूसरी सीढ़ियों का इस्तेमाल कर लोग वहां से निकल जाते। वहीं, स्थानीय लोग दावा कर रहे हैं कि इलाके में इसी तरह की कई इमारतें हैं, जहां बिना किसी लाइसेंस और फायर एनओसी के व्यावसायिक गतिविधियां की जा रही हैं। 150 से अधिक लोग काम करते थे इमारत में एक समय में।
जो जहां था, वहीं फंस गया
पूरी इमारत को अवैध रूप से ही बनाया गया था, इसलिए बिल्डिंग के मालिक ने वहां आग से बचाव कोई उपाय भी नहीं किए थे। यहां तक ऊपर कि सभी मंजिलों पर सीढ़ियों के साथ लगे गेट भी छोटे-छोटे थे। आग लगी तो सीढ़ियों का रास्ता एकदम बंद हो गया, जो लोग जिस मंजिल पर थे, वहीं फंस गए। हादसे के समय अंदर धुआं भरा तो लोगों ने इमारत में गली की ओर लगे शीशों को तोड़ा और रस्सी, क्रेन, सीढ़ी की मदद से बाहर निकले। कुछ ने तो छलांग भी लगा दी।