दिल्ली के अस्पतालों में बीते 24 साल के दौरान किडनी प्रत्यारोपण के मामलों में 31 गुना की बढ़ोतरी आई है। इनमें 80 फीसदी से भी अधिक रोगी आसपास के राज्यों से हैं। विशेषज्ञों के अनुसार क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) से ग्रस्त रोगियों में प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, प्रत्यारोपण के बाद रोगी का जीवन काफी चुनौतीपूर्ण रहता है।
बुधवार को विश्व किडनी दिवस की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से मिली जानकारी के अनुसार प्रत्यारोपण की तुलना में किडनी रोगियों की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि हर रोगी का प्रत्यारोपण नहीं हो पाता है।
एक अनुमान के अनुसार, दिल्ली के अस्पतालों में हर माह 50 हजार से भी ज्यादा किडनी रोगियों का डायलिसिस किया जाता है। एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि किडनी को नुकसान पहुंचने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन समय पर इलाज न मिले तो यह परेशानी बढ़ने लगती है।
सफदरजंग अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु वर्मा ने बताया कि क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) के सालाना मामले बढ़ रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि वर्ष 1995 की तुलना में अब समय काफी बदला है। लोग पहले की तुलना में अधिक जागरूक हुए हैं। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से मरीजों की जांच या पहचान भी आसान हुई है। हालांकि, इनके साथ बीमारी का दायरा भी बढ़ा है।
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) के मुताबिक साल 1995 से 2019 के बीच दिल्ली के अस्पतालों में 16728 किडनी प्रत्यारोपण हुए हैं। इस दौरान 4642 लिवर और 68 हार्ट प्रत्यारोपण हुए। साल 1995 में 56 मरीजों का किडनी प्रत्यारोपण हुआ था जो सालाना बढ़ते-बढ़ते 2015 में 1725 तक पहुंचा। वहीं साल 2019 में 1416 प्रत्यारोपण दर्ज हुए।
सरकारी अस्पतालों में आसान नहीं इलाज
दिल्ली में मौजूद सभी सरकारी अस्पतालों में किडनी रोगियों को उपचार नहीं मिलता है। एम्स, सफदरजंग, आरएमएल, लोकनायक, डीडीयू, रोहिणी और जीटीबी अस्पताल में इसका उपचार मिलता है लेकिन इन सभी जगह प्रत्यारोपण के लिए जहां एक मरीज को छह से 12 माह तक का इंतजार करना पड़ता है। वहीं डायलिसिस के लिए भी लंबी वेटिंग रहती है। स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि दिल्ली में हर साल सबसे अधिक प्रत्यारोपण प्राइवेट अस्पतालों में होते हैं। मैक्स, बीएलके, अपोलो, आकाश, बालाजी, धर्मशिला जैसे अस्पतालों में किडनी प्रत्यारोपण का खर्चा करीब पांच से 10 लाख रुपये तक आता है।