किताबें पढ़कर, दोस्तों व परिवार से बातचीत करके, इंडोर व आउटडोर खेलों में वक्त बिताकर बच्चों व किशोरों को मोबाइल की लत से निकाला जा सकता है। इसकी आभासी दुनिया से निकलने का यही बेहतर तरीका है। मनोचिकित्सकों ने इन तरीकों से बच्चों व किशोरों को इस लत से बाहर निकालने में कामयाबी भी पाई है। ऐसे पीड़ित अब सामान्य जीवन बिता रहे हैं।
यही कहानी डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग में पहुंचे 17 साल के किशोर की भी थी। इसने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। बात-बात में गुस्सा आ जाता था। यहां पहले अभिभावकों की फिर किशोर की काउंसलिंग शुरू हुई। बार-बार उसे समझाया गया। उनके माता व पिता को कहानियां सुनाने, बच्चे को किताब देने की सलाह दी गई। इसके साथ ही लक्षण के आधार पर दवाईयां भी दीं। उसको योग व ध्यान भी करवाया गया। अब उसके गुस्से पर तेजी से लगाम लगी और उसने फोन के इस्तेमाल को काफी कम कर दिया। फिलहाल किशोर की हालत बेहतर है और वह स्कूल जा रहा है।
कहानी, मोबाइल के आविष्कारक की जुबानी
मार्टिन कूपर अमेरिका के इंजीनियर हैं। लोगों के संबंधों का दायरा मजबूत करने के लिए उन्होंने मोबाइल का आविष्कार किया। लेकिन अब वह अपने ही आविष्कार से दु:खी हैं। इसकी वजह इसका बहुत ज्यादा होने वाला इस्तेमाल है। एक इंटरव्यू में मार्टिन कूपर ने कहा, वह दिन में बमुश्किल 72 मिनट, यानि 24 घंटे का पांच फीसदी वक्त ही मोबाइल पर बिताते हैं। उनकी सलाह है कि लोगों को मोबाइल ऑफ कर थोड़ी सी अपनी जिंदगी भी जी लेनी चाहिए।