गालिब ने कहा था - मेरे दुख की दवा करे कोई, इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई। डॉक्टर भी इब्न-ए-मरियम यानी ईसामसीह की तरह यही करते हैं। दूसरों को दुखों से मुक्ति दिलाते हैं। इसलिए उन्हें फरिश्ता कहा जाता है। डॉक्टरों के पास पहुंचने वाला हर फरियादी परेशान हाल होता है, लेकिन इलाज के बाद ठीक होकर खुशी-खुशी वापस लौटता है। जिंदगी देने के इस पेशे में कड़ी मेहनत, काबलियत व समर्पण ही काम आता है। आज डॉक्टर्स डे हैंऔर अमर उजाला ऐसे ही चिकित्सकों की याद कर रहा है, जिन्होंने अपनी काबिलियत का लोहा देश-दुनिया को मनवाया है।
रोबोट से सर्जरी कर बनाया विश्व रिकॉर्ड
सफदरजंग अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख
डॉ. अनूप कुमार ने रोबोट से इतनी सर्जरी कर दी कि विश्व रिकार्ड ही बन गया। अब तक ये रोबोटिक और 3-डी लेप्रोस्कोपी का उपयोग करके 205 सर्जरी की अंतरराष्ट्रीय स्तर वेबकास्टिंग कर चुके हैं। कुल 410 लाइव सर्जरी कर चुके हैं। इन लाइव सर्जरी की मदद से दुनियाभर के यूरोलॉजिस्ट प्रशिक्षित होते हैं। देश में मूत्र विज्ञान से जुड़े रोगों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके उपचार के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर व सुविधाएं सीमित हैं।
...और भर दिए आतंकियों के दिए घाव
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सर्जरी विभाग के प्रोफेसर
डॉ. एके सिंह राणा के लिए वो मंजर भूलना आसान नहीं है। 13 दिसंबर 2002 का दिन, प्रधानमंत्री काफिले के साथ संसद पहुंचना था, तभी पता चला कि हमला हो गया है। कुछ आतंकवादियों ने सुरक्षाकर्मियों पर ताबातोड़ फायरिंग की है। इसमें कई सुरक्षाकर्मी बुरी तरह से घायल हुए हैं। एक-एक करके काफी सारे सुरक्षा कर्मी अस्पताल पहुंच रहे थे। उनकी जान बचाने के लिए तुरंत सर्जरी शुरू करनी पड़ी।
... इलाज के लिए नहीं तरसेंगे छोटे कस्बों के मरीज
दूर-दराज कस्बों में रहने वालों को ब्रेन स्ट्रोक के बाद उपचार के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। जल्द ही उनके नजदीक ही सुविधा मिल जाएगी। इस सुविधा के लिए एम्स में न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख
डॉ. एमवी पद्मा श्रीवास्तव ने अपनी टीम के साथ ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। साथ ही आईआईटी दिल्ली के सहयोग से यंत्र तैयार किया है, जिसकी मदद से आसानी से ब्रेन स्ट्रोक को पकड़ कर उसका प्राथमिक उपचार किया जा सकेगा। इसका फायदा उन लाखों मरीजों को होगा जो उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं।
जब डॉक्टर छुट्टी ले रहे थे तब अकेले संभाली जिम्मेदारी
कोरोना काल में जब सभी डॉक्टर कोविड ड्यूटी से बचने के लिए छुट्टी ले रहे थे तो वहीं जिला अस्पताल और कोविड अस्पताल की सीएमएस
डॉ. रेनू अग्रवाल बिना छुट्टी के दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी हुई थीं। इस दौरान वो घर तक नहीं गईं। यहां तक कि उनको भी कोविड हो गया। इस दौरान भी वो फोन पर लगातार संपर्क में रहीं, ताकि मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। रेनू अग्रवाल ने बताया कि कोविड का दौर सभी के लिए मुश्किल भरा था। डॉक्टरों के लिए मरीजों का इलाज चुनौती था, लेकिन मरीज हमेशा मेरी प्राथमिकता हैं।