वैज्ञानिक और वरिष्ठ मौसम विज्ञानी प्रो. गुफरान बेग के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने अध्ययन में बताया कि लॉकडाउन के दौरान वायु गुणवत्ता में सुधार आने की जगह यह खराब स्तर पर दर्ज की गई है। इस दौरान शोधकर्ताओं ने सफर से एकत्रित आंकड़े और प्रतिदिन श्मशान घाट में हुए अंतिम संस्कारों को लेकर आकलन निकाला है।
बेहिसाब उत्सर्जन स्रोत वायु गुणवत्ता कर रहा था खराब
अध्ययन में पता चला कि लॉकडाउन के दौरान भी एक बेहिसाब उत्सर्जन स्रोत वायु गुणवत्ता को खराब स्तर पर लेकर जा रहा था। चूंकि, उस दौरान श्मशान घाट पूरी तरह से भरे हुए थे और एक दिन में सैकड़ों अंतिम संस्कार किए जा रहे थे। ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि उस दौरान अतिरिक्त कार्बोनेसियस जैव ईंधन का उत्सर्जन हो रहा था जो हवा की गुणवत्ता पर असर डाल रहा था।
अध्ययन में बताया कि दूसरी लहर के दौरान दिल्ली के श्मशान घाट पर औसतन 400 अंतिम संस्कार प्रतिदिन किए गए। तब एक-एक शव के अंतिम संस्कार में 300 से 400 किलोग्राम तक लकड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा था। उस दौरान पीएम 2.5 में अचानक वृद्धि भी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उस दौरान श्मशान घाट के अलावा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से आने वाली हवाओं की वजह से भी दिल्ली की वायु पर असर पड़ा। उस दौरान रेगिस्तानी क्षेत्र से धूल भरे माइक्रो कण दिल्ली तक पहुंच रहे थे। इन धूल भरी आंधियों की आवृत्ति सामान्य से अधिक भी थी। इन्हीं वजहों के चलते सबकुछ बंद होने के बाद भी दिल्ली गंभीर वायु प्रदूषण का सामना कर रही थी।