रेलवे में निजीकरण का मुद्दा संसद से लेकर स्टेशनों के प्लेटफार्म तक छाया हुआ है। स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपने के साथ ही पारंपरिक खानपान स्टॉल की जगह फूड कोर्ट बनाने से लाइसेंसी वेंडरों में नाराजगी है। 10 रुपये में यात्रियों को गर्मागर्म पूड़ी-सब्जी उपलब्ध कराने वालों के सामने भी रोजगार का संकट है। अखिल भारतीय रेलवे खानपान लाइसेंसीज वेलफेयर एसोसिएशन का आरोप है कि खानपान व्यवस्था बड़ी प्राइवेट कंपनियों के हवाले की जा रही है। छोटे खानपान लाइसेंसीज की समस्याओं को सरकार नजरअंदाज कर रही है।
पारंपरिक खानपान को तव्वजो कम
स्टेशनों पर खानपान व्यवस्था बड़ी कंपनियों के हवाले की जा रही है। छोटे खानपान लाइसेंसीज की समस्याओं को सरकार नजरअंदाज कर रही है। गरीब एवं मध्यम वर्ग के यात्रियों को स्वच्छ एवं गर्म खानपान की सुविधा जारी रहे, इसके लिए सरकार कदम उठाए। भारतीय रेल में यात्रा करने वाले लगभग 85 प्रतिशत रेल यात्री मध्यम एवं गरीब वर्ग से होते हैं, जिन्हें ज्यादातर गरम पूड़ी, पकोड़ा, गर्म चाय जैसे खानपान ही पसंद होते हैं। निजीकरण के कारण रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले लाखों लाइसेंसीस और वेंडरों को बेरोजगारी से बचाने के लिए सरकार को अपनी कार्य योजना शीघ्र घोषित करनी चाहिए।
- रविंद्र गुप्ता, अध्यक्ष, रेलवे खानपान लाइसेंसीज वेलफेयर एसोसिएशन
आम यात्री के भोजन की व्यवस्था भी पहले रेलवे द्वारा ही की जाती है। प्लेटफार्म पर ट्रॉली पर खाना बंद होने से 10 रुपये का खाना 100 रुपये में मिल रहा है। पहले स्टॉल पर पानी का भी विशेष इंतजाम होता था। यात्रियों को मुफ्त में पानी खाने के साथ मिलता था। अब तो बोतल बंद पानी लेने के लिए यात्री मजबूर हैं। पानी भी 20 रुपये में मिलता है। इससे गरीब यात्रियों की तो परेशानी बढ़ गई है। रेलवे की जमीन निजी हाथों में सौंपी जा रही है। इससे रेलवे को नुकसान होता है। वेंडर फीस भी देते हैं और जनता की सेवा भी करते हैं। सरकार के फैसले से लाखों लोग बेरोजगार होंगे।
- सोमनाथ मलिक, अध्यक्ष, उत्तरी रेलवे मजदूर यूनियन
वर्षों से नहीं बढ़ी चाय की कीमत
वर्षों से चाय की कीमत नहीं बढ़ाई गई है। 5 रुपये मूल्य की चाय के साथ 2 रुपये का कुल्हड़ देना होता है। रेलवे प्रशासन के आदेशानुसार चाय का रेट 3 रुपये रह गया है।