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दिल्लीः बिना तथ्यों का अध्ययन किए सुनाया फैसला, हाईकोर्ट ने की आलोचना

Sun, 07 Mar 2021 05:22 AM IST
दुष्यंत शर्मा विजय सिंघल, नई दिल्ली
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फाइल फोटो
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हाईकोर्ट ने केवल महिला के बयानों पर विश्वास कर विवाह को रद्द करने का फैसला देने पर फैमिली कोर्ट के जज को आड़े हाथ लिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह अचंभित करने वाला मामला है कि जज ने महत्वपूर्ण तथ्यों का अध्ययन करना भी उचित नहीं समझा और बुनियादी सिद्धांत का पालन किए बिना महिला की स्टोरी को सही मान कर फैसला सुना दिया। अदालत ने उक्त फैसले को रद्द कर दिया।

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न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रेखा पल्ली की खंडपीठ ने अपने फैसले में उक्त जज के रवैये पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा महिला ने कहा कि उसे 22 अप्रैल 2015 को पड़ोसी उषा ने अपने घर बातचीत करने के लिए बुलाया और उनके कथित पति व उनके परिवार के सामने जबरन कोल्ड ड्रिंक पिलाया जिससे वह अर्ध मूर्छित हो गई। 

होश आने पर उसे दीपक ने बताया कि वह उसकी पत्नी है और वहीं मारपीट कर उसके साथ रेप किया गया। जबकि विवाह प्रमाणपत्र के अनुसार उनका विवाह आर्य समाज मंदिर में 20 अप्रैल को हुआ था। इसके अलावा विवाह का रजिस्ट्रार के समक्ष पंजीकरण भी हुआ था। अदालत ने कहा महिला ने माना कि वह 27 अप्रैल तक उषा के घर ही रही और उसके पास मोबाइल फोन भी था। वह फोन का इस्तेमाल भी कर रही थी। 
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अदालत ने कहा कि यह समझ से परे है कि अपना घर होने के बावजूद महिला पड़ोसी के घर 22 से 27 अप्रैल तक क्यों रही। उसने मोबाइल फोन से पुलिस या अपने परिचितों को पड़ोसी के कब्जे से छुड़ाने के लिए फोन क्यों नहीं किया। विवाह का पंजीकरण रजिस्ट्रार के समक्ष हुआ था तो यह कैसे माना जा सकता है कि वह वहां अपनी इच्छानुसार नहीं गई थी। इन तथ्यों पर संबंधित जज ने विचार नहीं किया। 

खंडपीठ ने कहा कि संबंधित जज को गहराई से सभी तथ्यों का मूल्यांकन करना चाहिए जबकि ऐेसे में इस विवाह को जबरन विवाह नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा यह तथ्य ही महिला के विश्वास को हिलाने के लिए काफी है कि विवाह 20 अप्रैल को हुआ जबकि उसने 22 अप्रैल को पड़ोसी के बुलाने का तर्क रखा है।

हाईकोर्ट ने कहा संबंधित जज ने अविश्वास करने वाली स्टोरी को उचित मान कर अपना फैसला सुना दिया जो मानने योग्य नहीं है। ऐसे में वे फैमिली कोर्ट के 4 मार्च 2020 को दिए फैसले का खारिज करते हैं।

क्या था मामला.....
महिला ने आरोप लगाया था कि ईस्ट आजाद नगर निवासी उषा व उसके पति अश्वनी कुमार ने उसे परिवार से बात करने के लिए बुलाया था। इसके बाद कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए दिया व मना करने पर जबरन पिलाया गया। दीपक ने बताया कि वह उसका पति है और कुछ भी बोलने पर उसकी व मां की हत्या की धमकी दी। 27 अप्रैल को किसी तरह वह भाग कर अपनी मां के पास यूपी के बड़ौत निवास पर पहुंची। 

वह मां के साथ 30 अप्रैल को वापस आई और उसकी शिकायत पर पुलिस ने सभी के खिलाफ दुष्कर्म सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। दीपक ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। 
 

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नहीं मिल सकता संदेह का लाभ

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी को मात्र इस आधार पर संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता कि किसी पब्लिक के व्यक्ति को मामले में गवाह नहीं बनाया गया। अदालत ने कहा कि पेश साक्ष्यों व अन्य गवाहों के बयानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस तर्क पर हत्या व लूटपाट के आरोपी को मिली सजा रद्द करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की खंडपीठ ने अपने फैसले में माना कि इस मामले में जांच अधिकारी ने पब्लिक के किसी भी व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। ये जांच अधिकारी की लापरवाही मानी जा सकती है लेकिन इस का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि आरोपी को फर्जी मामले में फंसाया गया है।

अदालत ने कहा कि मामले में पेेेश गवाहों, साक्ष्यों व अन्य तथ्यों का मूल्यांकन जरूरी है और उनको विश्वास योग्य माना जा सकता है। अदालत ने कहा पेेेश मामले में मृतक की पत्नी, बेटी के बयानों के अलावा आरोपी से हुई जेवरात की बरामदगी से स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा है। ऐसे में आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत प्रदान नहीं की जा सकती। 

पेश मामले के अनुसार श्रेष्ठा विहार में 4 जुलाई 2019 को यशपाल की उनके नौकर सुरजीत मुंडा ने अपने साथियों के साथ मिलकर हत्या कर दी थी। आरोपियों ने उनकी पत्नी सुधा को घायल कर दिया और कार, नगदी व जेवरात लूट कर फरार हो गए थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी सुरजीत मुंडा पहले भी उनके घर काम कर चुका था और उसके स्थान पर दूसरे नौकर पूरन शर्मा को रखा गया। 

पूरन के अवकाश पर जाने के बाद पुन: सुरजीत मुंडा को घटना से कुछ दिन पूर्व ही नौकरी पर रखा गया था। निचली अदालत ने उसे सभी धाराओं में उम्रकैद व 80 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई भी साक्ष्य नहीं है और न ही शिनाख्त परेड करवाई गई। मृतक की पत्नी व बेटी के बयानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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