हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी को मात्र इस आधार पर संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता कि किसी पब्लिक के व्यक्ति को मामले में गवाह नहीं बनाया गया। अदालत ने कहा कि पेश साक्ष्यों व अन्य गवाहों के बयानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस तर्क पर हत्या व लूटपाट के आरोपी को मिली सजा रद्द करने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की खंडपीठ ने अपने फैसले में माना कि इस मामले में जांच अधिकारी ने पब्लिक के किसी भी व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। ये जांच अधिकारी की लापरवाही मानी जा सकती है लेकिन इस का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि आरोपी को फर्जी मामले में फंसाया गया है।
अदालत ने कहा कि मामले में पेेेश गवाहों, साक्ष्यों व अन्य तथ्यों का मूल्यांकन जरूरी है और उनको विश्वास योग्य माना जा सकता है। अदालत ने कहा पेेेश मामले में मृतक की पत्नी, बेटी के बयानों के अलावा आरोपी से हुई जेवरात की बरामदगी से स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा है। ऐसे में आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत प्रदान नहीं की जा सकती।
पेश मामले के अनुसार श्रेष्ठा विहार में 4 जुलाई 2019 को यशपाल की उनके नौकर सुरजीत मुंडा ने अपने साथियों के साथ मिलकर हत्या कर दी थी। आरोपियों ने उनकी पत्नी सुधा को घायल कर दिया और कार, नगदी व जेवरात लूट कर फरार हो गए थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी सुरजीत मुंडा पहले भी उनके घर काम कर चुका था और उसके स्थान पर दूसरे नौकर पूरन शर्मा को रखा गया।
पूरन के अवकाश पर जाने के बाद पुन: सुरजीत मुंडा को घटना से कुछ दिन पूर्व ही नौकरी पर रखा गया था। निचली अदालत ने उसे सभी धाराओं में उम्रकैद व 80 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई भी साक्ष्य नहीं है और न ही शिनाख्त परेड करवाई गई। मृतक की पत्नी व बेटी के बयानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।