हाईकोर्ट ने कहा कि ज्यादातर घरों में सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से महिलाएं काम नहीं कर सकतीं और इसलिए वे खुद को आर्थिक रूप से नहीं संभाल सकतीं। हालांकि जिन घरों में महिलाएं काम करती हैं और अपने खर्चे के लिए पर्याप्त कमाई करती हैं, वहां स्वाभाविक रूप से यह मतलब नहीं हो जाता कि वहां पति अपने बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को सुविधाएं प्रदान करना पिता का भी समान कर्तव्य है और ऐसी कोई स्थिति नहीं है जब सिर्फ मां को अपने बच्चों को पालने और उनकी शिक्षा का खर्च वहन करना पड़े।
कोर्ट ने कहा कि यह आसानी से मान लिया जाता है कि 18 साल की आयु में बच्चा 12वीं क्लास में है या स्नातक के पहले साल में है। लेकिन उसे इस स्थिति में नहीं रख सकते कि वह अपना खर्चा चलाने लायक कमाता हो। कोर्ट ने कहा कि इससे बच्चे की पढ़ाई का पूरा खर्चा मां पर आ जाता है और इसमें पिता का कोई योगदान नहीं होता। कोर्ट इस स्थिति का समर्थन नहीं कर सकती।
अलग हो चुके दंपत्ति की नवंबर 1997 में शादी हुई थी और उनके दो बच्चे हैं। उनका नवंबर 2011 में तलाक हो गया और अब बेटा 20 साल और बेटी 18 साल की है। कोर्ट को बताया गया था कि महिला दिल्ली नगर निगम में अपर डिवीजन क्लर्क के तौर पर काम करते हुए 60,000 रुपये प्रति महीने कमाती है और रिकॉर्ड्स बताते हैं कि व्यक्ति ने जो आय प्रमाण पत्र जमा किए थे, उनके अनुसार नवंबर 2020 को उसकी आय 1.67 लाख रुपये प्रति महीने थी।