उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्ष 2018 में उत्तीर्ण एक छात्रा को स्नातक की डिग्री जारी करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा उसे कुल 40 प्रतिशत न्यूनतम उत्तीर्ण अंक प्राप्त करने के आधार पर डिग्री हासिल करने का अधिकार है और यही उसके पाठ्यक्रम में शामिल होने का आधार बना। न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय उक्त तथ्य पर विचार करने में विफल रहा है कि याचिकाकर्ता की संपूर्ण शिक्षा एक प्रावधान के तहत थी।
याचिकाकर्ता बीए ने (ऑनर्स) अर्थशास्त्र शैक्षणिक सत्र 2015-18 के लिए श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला लिया था। उसने तर्क दिया कि यद्यपि उसने पाठ्यक्रम के सभी छह सेमेस्टर की परीक्षा प्रक्रिया से गुजरी है, उसने छठे सेमेस्टर में एक भी विषय पास नहीं किया है जिसके आधार पर उसकी डिग्री प्रदान नहीं की गई है। अपनी स्नातक की पढ़ाई के आधार पर याचिकाकर्ता ने सिम्बायोसिस इंटरनेशनल (डीम्ड) विश्वविद्यालय में एमबीए पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था और पढ़ाई पूरी की। लेकिन उसकी स्नातकोत्तर डिग्री प्रदान नहीं की जा सकी क्योंकि उसकी स्नातक की डिग्री जारी नहीं की गई थी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के वकील ने कहा कि 2017 में एक कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव द्वारा विश्वविद्यालय के अध्यादेश ढ्ढङ्ग में एक संशोधन किया गया था जिसमें उसी के खंड 12 (1) (ई) को संशोधित किया गया था। उक्त प्रावधान पर भरोसा करते हुए विश्वविद्यालय ने कहा कि याचिकाकर्ता डिग्री जारी करने के लिए योग्य नहीं थी, क्योंकि उसने प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के सभी प्रश्नपत्रों को पास नहीं किया था, जो कि डिग्री जारी करने के लिए अनिवार्य आवश्यकता थी। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि संशोधन का प्रभाव उस पर लागू नहीं होगा क्योंकि वह 2015 में कॉलेज में शामिल हुई थी।
कोर्ट ने कहा कि संशोधन से पहले, छात्रों को सैद्धांतिक परीक्षाओं और व्यावहारिक परीक्षाओं में तीसरे वर्ष, यानी ङ्कढ्ढ सेमेस्टर के अंत तक अलग-अलग सभी पेपरों को मिलाकर न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक हासिल करने थे। । कोर्ट ने कहा कि लेकिन संशोधन के बाद अब एक छात्र को सभी तीन वर्षों के सभी पेपर पास करने के बाद ही डिग्री के लिए योग्य घोषित किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि सवाल यह है कि क्या 2018 में आयोजित छठे सेमेस्टर की परीक्षाओं में एक विषय में उत्तीर्ण नहीं होने के कारण याचिकाकर्ता को संशोधित खंड 12 (1) (ई) के मद्देनजर डिग्री से वंचित किया जा सकता है। अदालत ने कहा चूंकि संशोधित खंड 2016 में प्रस्तावित किया गया था और इसलिए यह याचिकाकर्ता को बाध्य करेगा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।