यादव के अनुसार, मीडिया में भले ही कुछ भी बयानबाजी चल रही हो, नेता एक दूसरे पर धर्म को लेकर कैसी भी टीका-टिप्पणी कर रहे हों, मगर चुनाव में स्थानीय मुद्दे ही हावी रहेंगे। लोग शिक्षा पर बात करना पसंद करेंगे। वे स्वास्थ्य पर बोलेंगे और दूसरी सुविधाएं भी उनके दिमाग में रहेंगी।
अब आप दिल्ली में सीएए या 370 जैसे मुद्दों पर चुनाव जीतने की रणनीति बना रहे हों, तो उसमें कामयाबी मिलना बहुत मुश्किल है।
दूसरे राज्यों में तो विपक्ष का मतलब पूरी तरह से सरकार के बाहर होना होता है। दिल्ली में ऐसा नहीं है। यहां भाजपा के पास बहुत कुछ है। एमसीडी में भाजपा है। पुलिस और डीडीए सहित कई दूसरे महकमे केंद्र के नियंत्रण में होते हैं।
इन सबके चलते भाजपा की भी तो कोई जिम्मेदारी बनती है। चुनाव में लोग उससे नहीं पूछेंगे कि आपने क्या किया है। आपके पास भी तो पावर है, दिखाएं अपना रिपोर्ट कार्ड। दिल्ली की जनता को अच्छी तरह से मालूम है कि यहां भाजपा आधी सरकार चला रही है।
लेकिन जब कामों को गिनाने की बात आती है, तो दिल्ली भाजपा तुरंत खुद को विपक्ष में बताकर पल्ला झाड़ लेती है। बतौर योगेंद्र, मुझे लगता है कि भाजपा की 'घृणा' हारेगी। उनका यह मॉडल सफल होता नहीं दिख रहा।