हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सगाई होने का मतलब यह नहीं कि आरोपी अपनी मंगेतर का यौन उत्पीड़न, मारपीट या धमकी दे सकता है। अदालत ने मंगेतर से शादी के बहाने कई बार दुष्कर्म करने के आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने आरोपी की ओर से दिए गए तर्क को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की कि चूंकि दोनों पक्षों की सगाई हुई थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि शादी का झूठा वादा किया गया था। अदालत ने आदेश में कहा हालांकि इस तर्क का कोई बल नहीं है क्योंकि केवल सगाई होने का मतलब यह नहीं था कि आरोपी ने पीड़िता का यौन उत्पीड़न, पीटा या धमकी दी जा सकती है। अदालत ने कहा आरोप के अनुसार आरोपी ने पहली बार यौन संबंध भी शादी के बहाने बनाया था।
प्राथमिकी 16 जुलाई को धारा 376 व 323 के तहत दर्ज की गई थी। 16 सितंबर को मामले में आरोप पत्र दायर किया गया था।
पीड़िता ने आरोप लगाया था कि अक्तूबर 2020 से आरोपी से दोस्ती करने और लगभग एक साल तक साथ रहने के बाद उन्होंने पिछले साल 11 अक्टूबर को अपने परिवार के सदस्यों की सहमति से सगाई कर ली। प्राथमिकी के अनुसार सगाई के चार दिन बाद आरोपी ने पीड़िता के साथ इस बहाने जबरन शारीरिक संबंध स्थापित किए कि वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और जल्द ही शादी कर लेंगे। इसके पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने नशे की हालत में उसकी बेरहमी से पिटाई की और कई मौकों पर उसके साथ गैर-सहमति वाले शारीरिक संबंध स्थापित किए जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। इसके बाद आरोपी ने उसे कुछ गोलियां देकर गर्भपात करवा दिया।
प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि 9 जुलाई को जब पीड़िता आरोपी के घर गई तो उसने और उसके परिवार के सदस्यों ने शादी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा यह गंभीर प्रकृति का मामला है ओरापी ने उसे गोलियां देकर गर्भपात करवा दिया। पीड़िता एक महिला जो अभी तक अविवाहित है उसने अपने सम्मान को बचाने के कारणों के लिए इसका सबूत नहीं रखा। अदालत ने कहा इस प्रकार अपराध की गंभीरता आरोपों की प्रकृति और तथ्य यह है कि अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं और मुकदमा शुरू होना बाकी है। यह जमानत देने के लिए उपयुक्त मामला नहीं है।